बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 997, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६७८ नारदीयपुराणम् लभते वांच्छितान्कामानिहामुत्र च नारद । चैत्रकृष्णचतुर्दश्यामुपवासं विधाय च ॥७५॥ केदारोदकपानेन वाजिमेधफलं भवेत् । उद्यापने तु सर्वासां सामान्यो विधिरुच्यते ॥७६॥ कुंभाश्चतुर्दशैवात्र सपूगाक्षतमोदकाः । सदक्षिणांशुकास्ताम्रा मृन्मयाश्चाव्रणा नवाः ॥७७॥ तावंतो वंशदंडाश्च पवित्राण्यासनानि च । पात्राणि यज्ञसूत्राणि तावंत्येव हि कल्पयेत् ॥७८॥ शेषं प्रागुक्तवत्कुर्याद्वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥७८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थभागे द्वादशमासस्थितचतुर्द- शीतव्रतवर्णनं नाम त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२३॥
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच अथ नारद वक्ष्यामि शृणु पूर्णाव्रतानि ते । यानि कृत्वा नरो नारी प्राप्नुयात्सुखसंततिम् ॥१॥ चैत्रपूर्णा तु विप्रेंद्र मन्वादिः समुदाहृता । अस्यां सान्नोदकं कुंभं प्रदद्यात्सोमतुष्टये ॥२॥ वैशाख्यामपि पूर्णायां दानं सर्वस्य सर्वदम् । यद्यद्द्रव्यं ददेद्विप्रे तत्तदाप्नोति निश्चितम् ॥३॥
परलोक में अभिलषित फलों को प्राप्त करता है ॥७३-७४॥ चैत्र-कृष्णा-चतुर्दशी में उपवास कर शिवलिंग के चरणोदक के पान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। अब मैं समस्त चतुदर्शियों के उद्यापन करने की सामान्य विधि बता रहा हूँ। उद्यापन में मिट्टी के या तांबे के चौदह नवीन घड़े होने चाहिये, जो सुपारी, अक्षत, मिष्टान्न, वस्त्र तथा दक्षिणा से युक्त हों। उतनी ही संख्या में वंशदंड, पवित्र आसन, पात्र और यज्ञसूत्र का प्रबंध रहे । शेष बातें उन-उन व्रतों के साथ जैसी कही गई है, उसी प्रकार करें, परन्तु धन रहते कृपणता न करे ॥७५-७९॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में वृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थित चतुर्दशीव्रत वर्णन नामक एक सौ तेईसवां अध्याय समाप्त ॥१२३॥
अध्याय १२४ बारह मासों की पूर्णिमा का व्रत-निरूपण सनातन बोले--नारद ! अब मैं पूर्णातिथि के व्रतों को तुमसे बतला रहा हूँ, जिनके अनुष्ठान से नर या नारी को सुख-संतानों की प्राप्ति होती है। विप्रवर्य ! चैत्र की पूर्णा तिथि मन्वादि कहलाती है । उस दिन चंद्रमा की प्रसन्नता के लिये अन्न-जल-पूर्ण घट दान करना चाहिये । वैशाखी पूर्णिमा में जो द्रव्य दान किया जाता है, वह निःसंदेह प्राप्त होता है। उस दिन धर्मराजव्रत भी किया जाता है, उसे सुनो । वैशाख की पूर्णिमा में