बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तीसरे भाव में बहुत से पापग्रह हों तो बहुयुक्त अर्गला होती है और इसे निर्बाध अर्गला कहते हैं।।१०।। एकेन द्वितयेनापि अर्गला या भवेद्द्विज। सार्गला नैव विज्ञेया बहुपापयुतिं विना।।११।। एक ग्रह या दो ग्रह से जो अर्गला होती है वह फलदं नहीं होती है।।११।। चतुर्थे धनलाभस्था शुभपापकृतार्गला। तस्यापि बाधकाः खेटा व्योमारिष्फतृतीयाः।।१२।। चौथे, दूसरे, एकादश में शुभग्रह एवं पापग्रह से अर्गला योग होता है, किन्तु दशम, द्वादश और तीसरा स्थान उसका बाधक होता है।।१२।। क्रमेण ज्ञायते विप्र चतुर्थं व्योमबाधकम्। धने च व्ययभावं च भवेज्ज्ञेयं तृतीयकम्।।१३।। चौथे का दशमं, दूसरे का द्वादश और एकादश का तीसरा स्थान बाधक होता है।।१३।। निर्बाधका च फलदा न दातव्या सबाधका। चिन्तनीयं प्रयत्नेन तत्फलं द्विजपुङ्गव।।१४।। अर्थात् बाधक स्थानों में ग्रहों के होने से अर्गला योग नहीं होता है। निर्बाध अर्गला फलदायक और सबाधक अर्गला निष्फल होती है।।१४।। अर्गलाया बाधकानां बाधकान् कथयेऽधुना। नूनं सा निर्बला खेटा ज्ञायते गणकैस्तदा।।१५।। अर्गला योग से बाधक ग्रहों के बाधकों को मैं कह रहा हूँ, निश्चय ही वह निर्बल ग्रह होता है।।१५।। वित्तलाभचतुर्थानां यः पश्यति शुभार्गलाम्। व्ययभ्रातृनभस्थाश्चेद्विपरीतार्गला द्विज।।१६।। दूसरे, ग्यारहवें ओर चौथे भाव को देखता हो तो शुभ अर्गला होती है। किन्तु १२वें, ३रे और १०वें स्थान में स्थित ग्रह देखते हों तो विपरीत अर्गला होती है।।१६।। पुनर्योगार्गलं ज्ञेयं त्रिकोणे पूर्ववद्द्विज। पञ्चमे चार्गलास्थानं नवमस्तद्विरोधकः।।१७।।