बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाऽर्गलाध्यायः १७३ इसी प्रकार त्रिकोण (५।९) अर्गला योग होता है। ५वें भाव में ग्रह हो तो अर्गला होता है, किन्तु नवम भाव में कोई ग्रह हो तो अर्गला नहीं होता है।।१७।। विपरीतेन केतुश्च नवमेऽर्गलकारकः। पञ्चमस्थस्तद्विरोधो ज्ञायते गणकैर्द्विज।।१८।। केतुग्रह विपरीत यानि ९वें भाव में अर्गला योगकारक और पाँचवें भाव में वाचक होता है।।१८।। क्रमेण केतुः प्रकरोत्यर्गलां द्विज। नवमस्थस्तद्विरोधो लग्नार्गलमिदं विदुः।।१९।। हे द्विज ! केतु ग्रह भी क्रम से अर्गला योग करता है। किन्तु नवमस्थ ग्रह उसका विरोधी होता है, इसे लग्नार्गल कहते हैं।।१९।। राश्यर्गलं च खेटानां चिन्तयेद्विविधार्गलम्। यस्या यस्या दशा प्राप्ता तस्यां तस्यां फलं भवेत्।।२०।। इसी प्रकार राशियों का भी अर्गला योग विचार करना चाहिए।।२०।। यत्र राशिस्थितः खेटंस्तस्य पाकान्तरे भवेत्। तत्काले च फलं वाच्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२१।। जो-जो अर्गलायोगकारक ग्रह हों उनके दशा अन्तर में अर्गला योग का फल होता है।।२१।। सारांश यह है कि जिस किसी भाव या ग्रह का विचार किया जाय तो यह देखना चाहिए कि उस भाव या ग्रह से चौथे, दूसरे और ग्यारहवें भाव में कोई ग्रह हो तो उस भाव या ग्रह का अर्गला योग होता है। किन्तु उक्त अर्गला योग का भंग भी होता है अर्थात् राशि का ग्रह से चौथे भाव में ग्रह के होने से अर्गला होता है, यदि राशि का ग्रह से दशमस्थ कोई ग्रह न हो। इसी दूसरे भाव में योग होता है, किन्तु १२वें कोई ग्रह न हो तथा ग्यारहवें भाव में योग होता है, यदि तीसरे भाव में कोई ग्रह न हो। यदि योगकारक ग्रह से बाधक ग्रह निर्बल या संख्या में कम हों तो अर्गला का प्रतिबंध नहीं होता है। इसी प्रकार राशि या ग्रह से तीसरे भाव में तीन से अधिक खल ग्रह हों तो निर्विरोधी अर्गला योग होता है। इसी प्रकार ५वें भाव में भी अर्गला योग होता है, यदि नवम में कोई ग्रह न हों तो। केतुग्रह का विपरीत अर्गला योग होता है अर्थात् बाधक स्थान में अर्गला और योगस्थान में प्रतिबंधक होता है।