भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 800 में से

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पृष्ठ 106

१०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि ग्रहों के अंश तुल्य हों तो दोनों ही एक कारक होते हैं ।।१९।। तत्कारको लुप्यति चेदन्यन्नैवास्ति कारकम् । कारकाणां स्थिराणां च मध्ये सञ्चितयेद्विज ।।२०।। वहाँ दोनों का नाश हो जाता है, फिर स्थिरकारक से ही फल को देखना चाहिए ।।२०।। अथ योगकारकमाह- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि खेटान् कारकसंज्ञकान् । यस्य जन्मनि भावानां यथास्थाने च वै द्विज ।।२१।। अब मैं योग करने वाले कारक ग्रहों को कह रहा हूँ ।।२१।। स्वक्षे तुङ्गे च मित्रर्क्षे कण्टके संस्थिता ग्रहाः । अन्योन्यकारका विप्र कर्मगास्तु विशेषतः ।।२२।। जन्म समय ग्रह अपनी उच्चराशि, अपनी राशि वा अपने मित्र की राशि में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो परस्पर कारक (भाग्योदय) करने वाले होते हैं। इसमें भी दशम स्थान में विशेष योगकारक होते हैं ।।२२।। लग्ने सुखे तथा कामे ग्रहभाववशेन च । भवन्ति कारका विप्र विशेषेण च खेगताः ।।२३।। लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम में कारक होते हैं, विशेषतः दशम में कारक होता है ।।२३।। स्वमित्रर्क्षोच्चगो हेतुरन्योन्यं यदि केन्द्रगः । ससुहृद्गणसम्पन्नः सोऽपि कारक एव वै ।।२४।। यदि ग्रह अपने मित्र, राशि, उच्च में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो वे भी परस्पर कारक होते हैं ।।२४।। नीचान्वये यस्य जन्म बभूव द्विजसत्तम । पतन्ति कारका लग्ने प्रधानत्वं च स आप्नुयात् ।।२५।। नीच वंश में उत्पन्न हो और योगकारक ग्रहों से योग होता हो तो वह अपने कुल में प्रधान होता है ।।२५।। राज्ञां कुले समुत्पन्नो राजा भवति निश्चितम् । एवं कुलानुसारेण कारकाणां फलं भवेत् ।।२६।।

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