बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ कारकाध्यायः १०७ जिस प्रकार राजा के क्रोधित होने से सभी मंत्री आदि अपने मन का कार्य करने में असमर्थ होते हैं।।१०।। यथा राजाज्ञया विप्र पुत्रामात्यादयोऽपि च। समर्था लोककार्येषु तथैवान्योन्यकारकः।।११।। कारकराजवश्येन फलदातान्यकारकः। यथा राजनि क्रुद्धे च सर्वेऽमात्यादयो द्विज।।१२।। स्वजनानां कार्यकर्त्तुमसमर्था भवन्ति हि। स्निग्धे भूपे ह्यमात्यादिः स्वशत्रूणां द्विजोत्तम।।१३।। अकार्यं कर्तु नो शक्तस्तथैवान्योपकारकः। आत्मकारकवश्येन ह्यमात्यादि फलं ददुः।।१४।। यदि राजा प्रसन्न होते हैं तो मंत्री आदि अपने शत्रु का भी अहित नहीं करते हैं, उसी प्रकार अन्य कारक भी आत्मकारक के वश में होते हैं।।१४।। आत्मकारकखेटेन न्यूनभागो हि यद्ग्रहः। अमात्यसंज्ञा तस्यैव ज्ञायते द्विजसत्तम।।१५।। आत्मकारक ग्रह से न्यून अंशवाला ग्रह अमात्यकारक होता है।।१५।। अमात्यन्यूनो भ्राता च भ्रातृन्यूनं च मातृकम्। मातृकारकखेटेन न्यूनभागो हि यो ग्रहः।।१६।। इससे न्यून अंश वाला ग्रह भ्राताकारक, इससे न्यून अंश वाला मातृकारक, इससे न्यून पुत्रकारक।।१६।। सपुत्रकारको ज्ञेयस्तद्धीनो ज्ञातिकारकः। ज्ञातिकारकखेंटेन हीनभागो हि यो ग्रहः।।१७।। इससे न्यून अंश वाला ग्रह शांति (जाति) कारक, इससे न्यून अंश वाला ग्रह।।१७।। दारकारकविज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम। चराश्च कारकाः सप्त ब्रह्मणा चोदितः पुरा।।१८।। स्त्रीकारक होता है। यही सात चरकारक होते हैं।।१८।। अंशसाम्यौ ग्रहौ द्वौ च जायेतां यस्य जन्मनि। स्वकारकं विना विप्र लुप्यति चात्मकारकः।।१९।।