बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अंशसाम्यग्रहो यत्र कलाधिक्यं च पश्यति। कलासाम्ये पलाधिक्यमात्माकारक ईर्यते ।।४।। जहाँ ग्रहों के अंश तुल्य हो वहाँ कला से अधिकता लेना चाहिए और कला समान हो तो विकला से जो अधिक हो वही आत्मकारक होता है।।४।। तत्र राशिकलाधिक्ये नैव ग्राह्यः प्रधानकः। अंशाधिक्ये कारकः स्यादल्पभागोऽन्तकारकः ।।५।। राशि और कला से अधिक हो तो वह आत्मकारक नहीं होता है। जिसका अंश अधिक हो वही आत्मकारक होता है, अल्प अंश वाला अंतिमकारक होता है।।५।। मध्यांशो मध्यखेटः स्यादुपखेटः स एव हि। अधोऽधः कारका ज्ञेयाश्चराणि सप्तकारकाः ।।६।। दोनों के मध्य अंश वाले अन्य कारक होते हैं। क्रम से कारक होते हैं उसी को उपकारक कहते हैं।।६।। तेषां मध्ये प्रधानं तु आत्मकारक उच्यते। जातकराट् स विज्ञेयः सर्वेषां मुख्यकारकः ।।७।। इन सभी में आत्मकारक प्रधान जातक का स्वामी होता है, इसी को मुख्यकारक कहते हैं।।७।। यथा भूमौ प्रसिद्धोऽस्ति नराणां क्षितिपालकः। सर्ववार्ताधिकारी च बन्धकृन्मोक्षकृत्तथा ।।८।। जिस प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों में राजा बंधन, मोक्ष आदि सभी बातों का अधिकारी होता है।।८।। पुत्रामात्यप्रजानां तु तत्तद्दोषगुणैस्तथा। बन्धकृन्मोक्षकृद्विप्र तथा सम्मानकारकः ।।९।। वही पुत्र, मंत्री और प्रजा का उनके गुण-दोष के अनुसार बंधन, मोक्ष तथा सम्मान आदि करने वाला होता है। उसी प्रकार कारकराज के वश से अन्य कारक फल देने वाले होते हैं।।९।। तथैव कारको राजा ग्रहाणामात्मकारकः। आत्मेत्यादि फलं दत्ते चान्यथा स्थापयेद्द्विज ।।१०।।