बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ कारकाध्यायः १०५ लग्नसप्तमयोगेन भाग्ययोगं विचिन्तयेत्। भाग्यप्रबलता ज्ञेया लग्नसप्तशुभार्गला।।२९।। लग्न और सप्तम के योग से भाग्ययोग की चिंता करनी चाहिए। लग्न सप्तम में शुभ कृत अर्गला हो तो भाग्य की प्रबलता जाननी चाहिए।।२९।। शुभार्गले स्ववृद्धिः स्यात्पापे स्वल्पधनं वदेत्। उभयार्गले तु तत्रैव क्वचिद्वृद्धिः क्वचित् क्षयम्।।३०।। शुभग्रह की अर्गला में धन की वृद्धि और पापग्रह की अर्गला में अल्पधन की हानि होती है।।३०।। तत्तद्राशिदशायां तु अर्गलाफलसिद्धये। शुभो वाऽप्यशुभो वापि ह्यर्गला फलदायकः।।३१।। उन-उन राशियों के अर्गला फल को देने वाले शुभग्रह शुभफल और पापग्रह अशुभ फल को देने वाले होते हैं।।३१।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां अर्गलाफलकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः। अथ कारकाध्यायः अथाग्रे सम्प्रवक्ष्यामि ग्रहाणां कारकान् द्विज। आत्मादिकारकान् सप्त यथावत् कथयामि ते।।१।। हे द्विज ! अब मैं ग्रहों के आत्मा आदि सात कारकों को कहूँगा।।१।। रव्यादिशनिपर्यन्ता भवन्ति सप्तकारकाः। अंशैः समौ ग्रहौ द्वौ च राह्वन्तान् गणयेद्विज।।२।। रवि आदि ग्रह सात किसी-किसी के मत से राहु पर्यन्त आठ कारक होते हैं। यदि दो ग्रहों में अंश साम्य हो तो राहु पर्यन्त ८ ग्रहों में कारक का विचार करना चाहिए।।२।। रव्यादिपङ्गुपर्यन्तमंशाधिकग्रहो द्विज। कारकेन्द्रोऽथ स ज्ञेयो आत्माकारक उच्यते।।३।। रवि से राहु पर्यन्त ग्रहों में भी जो ग्रह अंश से अधिक हो वह आत्मकारक ग्रहों का राजा होता है।।३।।