बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु से पाँचवें पुत्र का, शुक्र से सातवें स्त्री का और शनि से आठवें भाव में आयु का विचार करना चाहिए।। ३३ ।। अथ भावकारकमाह- अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषं भावकारकम् । जनुर्लग्नं च विद्याद्धै आत्मकारकमेव च ।। ३४ ।। अब विशेषकर भावकारक को कह रहा हूँ। जन्मलग्न आत्मकारक ।। ३४ ।। धनभावं विजानीयाद्दारकारकमेव च । एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकाः ।। ३५ ।। धनभाव स्त्रीकारक, ग्यारहवाँ ज्येष्ठ भाई का और तीसरा कनिष्ठ ।। ३५ ।। सुते सुतं विजानीयाद्दारं सप्तमभावतः । सुतस्थाने ग्रहस्तिष्ठेत्सोऽपि कारक उच्यते ।। ३६ ।। पंचम भाव पुत्र का और सातवाँ स्त्री का कारक होता है। पाँचवें भाव में यदि कोई ग्रह हो तो वह भी उस भाव का कारक होता है ।। ३६ ।। सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः ।। ३७ ।। गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः ।। ३७ ।। क्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध, गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं ।। ३७ ।। पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम् । लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा । एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम् ।। ३८ ।। फिर भी लग्न आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ भाव- इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है ।। ३८ ।। चत्वारो राशयो भद्राः केन्द्रकोणशुभावहाः । तेषां संयोगमात्रेण अशुभोऽपि शुभो भवेत् ।। ३९ ।। केन्द्र और कोण ये चार भाव शुभद हैं। इनके संयोग से जो भाव हो वह भी शुभद होता है।। ३९ ।।