भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 800 में से

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कारकांशफलमाह १२१ जो योग ऊपर कहे गये हैं सभी में गुरु का योग और दृष्टि हो तो योग का फल अवश्य होता है। किसी-किसी का मत है कि कारकांश से दूसरे स्थान में भी इसी प्रकार विचार करना चाहिए।।५५।। कारकांशात्षष्ठभावफलम्- स्वांशात्तृतीये षष्ठे च पापस्तिष्ठेच्चे द् द्विज । कर्षको जायते बालः नात्र कार्या विचारणा ।।५६।। आत्मकारक से तीसरे, छठे स्थान में पापग्रह हों तो जातक किसान होता है।।५६।। कारकांशात्सप्तमभावफलम्- कारकांशाच्च द्यूने चेद्गुरुचन्द्रयुते द्विज। सुन्दरी गृहिणी तस्य पतिभक्तिपरायणा ।।५७।। आत्मकारक से सातवें भाव में गुरु-चन्द्रमा हों तो जातक की स्त्री सुन्दरी और पतिव्रता होती है।।५७।। राहुणा विधवा भार्या जायते नात्र संशयः। शनिना च वयोधिक्या रोगिणी वा तपस्विनी ।।५८।। यदि सातवें राहु हो तो विधवा स्त्री का संयोग होता है। यदि शनि हो तो अवस्था में अधिक, रोगिणी या तपस्विनी होती है।।५८।। भौमेन विकलाङ्गी च तथा कान्ताद्यलक्षणा। रविणा स्वकुले गुप्ता आसक्ता परवेश्मनी ।।५९।। भौम हो तो अंग से हीन, सूर्य हो तो अपने कुल में गुप्तरिति से रहती हुई दूसरे के वश में रहती है।।५९।। बुधे कलावती ज्ञेया कलाभिज्ञा प्रजायते। शुक्रेण तद्विज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।६०।। बुध हो तो कला को जानने वाली स्वयं कलाविद् होती है। इसी प्रकार शुक्र से भी जानना चाहिए।।६०।। कारकांशादष्टमभावफलम्- कारकांशाल्लये चन्द्रे कुजराहुनिरीक्षिते । क्षयरोगो भवेत्तस्य श्वासकासादिरोगयुक् ।।६१।। कारकांश से आठवें भाव में चन्द्रमा हो और भौम-राहु से देखा जाता हो तो जातक क्षयरोग और श्वास-कास रोग से युक्त होता है।।६१।।

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