भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा को भौम देखता हो तो राजरोग (यक्ष्मा) और रक्तपित्त से कष्ट होता है।।८९।। अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे शिखिना वीक्षिते सति । नीलकुष्ठं भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।९०।। केतु कारकांश से चौथे चन्द्रमा को देखता हो तो नीलकुष्ठ होता है।।९०।। चतुर्थे पञ्चमे वापि युतौ राहुकुजौ यदि। क्षयरोगो भवेत्तस्य चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः।।९१।। कारकांश से चौथे या पाँचवें राहु-भौम हों तो क्षयरोग होता है। चन्द्रमा देखता हो तो विशेषकर कुष्ठरोग होता है।।९१।। स्वांशात्तूर्ये सुते वापि केवलः संस्थितः कुजः। पिटकादि भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।९२।। कारकांश से चौथे या पाँचवें केवल भौम हो तो पिटक आदि क्षुद्र रोग होते हैं।।९२।। तत्र स्थिते च शिखिना ग्रहणीरोगपीडितः। स्वर्भानुर्गुलिके तत्र विषवैद्यो विषात्तिकः।।९३।। यदि उन्हीं भावों में केतु हो तो संग्रहणी रोग होता है। यदि उक्त भावों में राहु और गुलिक हो तो विषवैद्य या विष से कष्ट पाने वाला होता है।।९३।। कारकांशाद्धने तुर्ये केवलं संस्थिते शनौ। धनुर्विद्याधिको बालो जायते नात्र संशयः।।९४।। कारकांश से दूसरे या चौथे भाव में शनि हो तो धनुष विद्या को जानने वाला होता है।।९४।। कारकांशात्सुखे वित्ते केवले संस्थिते शिखी। घटिकायन्त्रवादी स्यादिष्टशोधनतत्परः।।९५।। कारकांश से चौथे वा दूसरे भाव में यदि केतु हो तो घटिकायंत्र को जानने वाला होता है।।९५।। उक्तस्थाने स्थिते सौम्ये जातस्तु परमहंसकः। तथा संन्यस्तकं ज्ञेयं निर्विशङ्को द्विजोत्तम।।९६।। पूर्वोक्त स्थान में बुध हो तो परमहंस या संन्यासी दंडधारी।।९६।।