बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाऽऽरूढमाह १३१ सन्मार्ग से द्रव्य पैदा करने वाला नीतियुक्त होता है और धार्मिक तथा शास्त्रज्ञ होता है।।८।। पदादेकादशे विप्र पापखेटयुतेक्षिते। अन्यायोपार्जितं वित्तं विरुद्धं शास्त्रमार्गतः।।९।। यदि पद से ११वें भाव में पापग्रह वा पापग्रह देखते हों तो अन्याय से द्रव्य को पैदा करने वाला और शास्त्र से अनभिज्ञ होता है।।९।। मिश्रैर्मिश्रफलं ज्ञेयमुच्चमित्रादिक्षेत्रगः। बहुधा जायते लाभो यत्र तत्र द्विजोत्तम।।१०।। यदि शुभग्रह और पापग्रह दोनों से दृष्ट-युत हों तो दोनों फल होता है। यदि उच्च-मित्र आदि के गृह में हों तो प्रायः लाभ ही होता है।।१०।। आरूढाल्लाभभवनं ग्रहः पश्येत्तु न व्ययम्। यस्य जन्मनि सोऽपि स्यात्प्रबलो धनवानपि।।११।। यदि शुभाशुभ ग्रह उच्चराशि में बैठे हों और ११वें भाव को देखते हों तो अनेक प्रकार से लाभ होता है, परन्तु १२वें भाव को न देखते हों तो।।११।। दृष्टग्रहाणां बाहुल्ये तथा द्रष्टरि तुङ्गगे। सार्गले चापि तत्रापि बह्वर्गलसमागमे।।१२।। यदि बहुत से ग्रह अपनी उच्चराशि में होकर ११वें भाव को देखते हों और अर्गला योग करते हों।।१२।। शुभग्रहार्गले तत्र तत्राप्युच्चग्रहार्गले। सुखानि स्वामिनां दृष्टे लग्नभाग्यादिगेन वा।।१३।। उच्चराशिस्थ शुभग्रह का अर्गला योग हो तो बालक अत्यंत सुख को पाता है।।१३।। जातस्य पुंसः प्राबल्यं निर्दिशेदुत्तरोत्तरम्। उक्तयोगेषु खेटाश्चेद्द्वादशं नैव पश्यति।।१४।। लग्न, भाग्य में बैठे हुए ग्रह से देखा जाता हो, जो द्वादशभाव को न देखता हो तो जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता है।।१४।। पदाद्द्वादशभावादीनां फलम्- आरूढाद्द्वादशे विप्र शुभपापयुतेक्षिते। व्ययाधिक्यं भवेदेवं विशेषोपार्जनात्तथा।।१५।।