भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

१३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यावद्दूरं यस्य राशिस्तावत्संख्याक्रमेण वै। अग्रे लग्नारूढपदं ज्ञायते द्विजसत्तम ॥३॥ जिस ग्रह की राशि उस ग्रह से जितनी दूर हो उतनी ही संख्या आगे उस ग्रह की लग्नारूढ़ राशि होती है॥३॥ जन्मुर्लग्नाल्लग्नस्वामी यावद्दूरं हि तिष्ठति। तावद्दूरं तदग्रे च लग्नारूढं च कथ्यते॥४॥ जन्मलग्न से लग्नेश जितनी दूर राशि पर हो उतनी ही राशि आगे जो राशि हो उसे लग्नारूढ़ राशि रहते हैं॥४॥ यदि लग्नेश्वरः स्वर्क्षे कलत्रे संस्थितोऽथवा। आरूढलग्नमित्याहुर्जन्मलग्नं द्विजोत्तम ॥५॥ यदि लग्नेश अपनी राशि के सप्तम में हो तो जन्मलग्न ही आरूढ़ लग्न होती है॥५॥ एकं तन्वादिभावानां भावारूढपदं भवेत्। यत्र यत्र ग्रहा लग्ने तत्र तत्र सुसंलिखेत् ॥६॥ इसी प्रकार तन्वादि भावों का प्रत्येक का आरूढ़ बनाना चाहिए॥६॥ इस प्रकार लग्नारूढ़ को लग्न मानकर चक्र बनावे। उसमें जो ग्रह जिस स्थान में हो वहाँ लिखकर फल कहे। विशेष— यहाँ पद और आरूढ़ शब्द दोनों एकार्थक हैं। जैमिनि के मत से यदि लग्नेश लग्न से चौथे भाव में हो तो चतुर्थभावगत राशि और सातवें भाव में हो तो दशमभावगत राशि लग्न का पद होता है। जैसे मिथुन लग्न का स्वामी बुध वृश्चिक राशि में है, मेषादि गणना से वृश्चिक की संख्या ५ है, अतः वृश्चिक से ५वीं मेष राशि ही मिथुन लग्न का पद हुआ। प्रायः लग्न के पद से ही विचार करना चाहिए। पदादेकादशस्थानफलम्— पदादेकादशे स्थाने शुभग्रहयुतेक्षिते। लक्ष्मीवाञ्जायते बालः प्रजावाञ्छीलसंयुतः ॥७॥ पद से ११वें भाव में शुभग्रह हों या देखते हों तो बालक धनी, पुत्रवान् और शीलवान् होता है॥७॥ वित्तोपार्जनन्यायेन नीतिवाञ्जायते सदा। नरो न नास्तिको नूनं न तु शास्त्रविरुद्धकृत् ॥८॥