बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाऽऽरूढमाह १२९ एवं दशाप्रदाद्राशेर्द्वितीयाष्टमयोर्द्विज। ग्रहसाम्ये च विज्ञेयः केमद्रुः शशिनेक्षिते ।।१९१।। इसी प्रकार दशाप्रद राशि से दूसरे, आठवें भाव में ग्रहसाम्य हो और चन्द्रमा देखता हो तो केमद्रुम योग होता है।।१९१।। दशाप्रारम्भसमये शोधयेज्जन्मलग्नवत्। सूर्यादिखेचरान् स्पष्टान् साधयेज्जन्मवद्द्विज।।१९२।। दशा प्रवेश समय में सूर्यादि ग्रहों और लग्न को साधना चाहिए।।१९२।। तत्र वित्ताष्टमे भावे ग्रहसाम्यो यदा भवेत्। तदा केमद्रुमो ज्ञेयश्चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः ।।१९३।। उस समय उक्त भावों में ग्रहसाम्य और चन्द्रमा की दृष्टि हो तो केमद्रुम योग होता है।।१९३।। एवं तन्वादिभावानां दशारम्भेषु योजयेत्। तत्तद्ग्रहानुसारेण फलं वाच्यं बुधैः सदा ।।१९४।। इसी प्रकार तनु आदि भावों की दशा के आरंभ में भी योजना करना चाहिए। क्योंकि उस समय के ग्रह के अनुसार ही फल होता है।।१९४।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां कारकांशफलकथनं नामाऽष्टमोऽध्यायः। अथाऽऽरूढमाह अधुना सम्प्रवक्ष्यामि राश्यारूढपदं द्विज। राशीनां द्वादशानान्तु यावदीशाश्रयो भवेत् ।।१।। अब मैं राशि का आरूढ़-पद कहता हूँ— बारह्रों राशियों का उसके स्वामी जहाँ बैठे हों, उस राशि के राशि की संख्या जितनी हो।।१।। संख्या त्वीशोदयादग्रे समाना तत्पदं वदेत्। राशिवद्ग्रह आरूढं ज्ञायते गणकैर्जनैः ।।२।। उतनी संख्या और आगे गिनने से जो राशि हो वही आरूढ़ लग्न या पद होता है। इसी प्रकार अर्थात् राशि के ही समान ग्रहों का भी आरूढ़ लग्न होता है।।२।।