बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशे स्थिते केतौ पञ्चमे वापि संस्थिते । गणितज्ञो भवेन्नूनं ज्योतिषशास्त्रविशारदः ।।१०४।। कारकांश में या पाँचवें भाव में केतु हो तो गणित को जानने वाला ज्योतिषशास्त्र में प्रवीण होता है।।१०४।। सुराचार्येण सम्बन्धात्साम्प्रदायिकसिद्धिकृत्। ये योगा पञ्चमे भावे यथावद्भाषितं मया ।।१०५।। सभी योगों में गुरु का संबंध होने से साम्प्रदायिक कार्यों की सिद्धि होती है। जो योग पाँचवें भाव में कहा है उसमें गुरु का योग होने से फल होता है।।१०५।। वित्तस्थानेऽपि ते ज्ञेया पूर्ववत्फलसिद्धिदम् । कोऽपि तृतीयभावे तु कथयन्ति पुरो द्विज ।।१०६।। जो योग मैंने पाँचवें भाव में कहे हैं उन्हें दूसरे भाव में भी जानना चाहिए। किसी प्राचीन आचार्य ने तीसरे भाव में भी देखने को कहा है।।१०६।। कारकांशे धने केतौ तथा भाग्यालये गते । पापग्रहेण सन्दृष्टे वाचालश्च भवेन्नरः ।।१०७।। कारकांश में वा उससे दूसरे या ९वें भाव या ५वें भाव में केतु हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो मनुष्य वाचाल होता है।।१०७।। अंशाल्लग्नात्तथारूढाद्धने रन्ध्रे स्थिते द्विज । पापसाम्ये च विज्ञेयो योगः केमद्रुमो भवेत् ।।१०८।। कारकांश लग्न तथा आरूढलग्न से दूसरे, आठवें भाव में यदि समान पापग्रह हो तो केमद्रुम योग होता है।।१०८।। चन्द्रदृष्टिविशेषेण योगः केमद्रुमो मतः । द्वितीयाष्टमभावाभ्यां योगोऽयं कथ्यते द्विज ।।१०९।। चन्द्रमा देखता हो तो विशेष रूप से केमद्रुम होता है। दूसरे और आठवें भाव में विशेषकर यह योग होता है।।१०९।। कारकांशेषु ये योगाः पूर्वोक्ता गदितो मया । तत्तद्राशिदशापाके सर्वेषां फलमादिशेत् ।।११०।। कारकांश से जिन योगों को मैंने कहा है उनका फल उन राशियों के दशा-अंतर में होता है।।११०।।