बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आरूढाद्वित्तभे सौम्ये सर्वदेशाधिपो भवेत्। सर्वज्ञो वा भवेद्बालः कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।२९ ।। पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सभी देशों का स्वामी होता है अथवा सर्वज्ञ होता है। केवल शुक्र हो तो कवि और वक्ता होता है।।२९।। आरूढात्केन्द्रकोणेषु तथा लाभपदे द्विज। लग्नदारपदे वापि सबलग्रहसंयुते ।।३० ।। श्रीमांश्च जायते नूनं देशं विख्यातिमान् भवेत्। षष्ठाष्टमे व्ययस्थाने श्रीमान्स न भवेत्तदा ।।३१।। पद से केन्द्र तथा कोण में लाभ पद में अथवा लग्न दारपद में बलवान् ग्रह हों तो श्रीमान् और प्रसिद्ध होता है। यदि छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हों तो श्रीमान् नहीं होता है।।३०-३१।। पदालग्ने सप्तमे वा केन्द्रत्रिकोणोपचये। सुवीर्यसंस्थिते खेटे भार्याभर्तृसुखप्रदः ।।३२।। पद से लग्न में वा सातवें वा केन्द्र, त्रिकोण, उपचय स्थान में बली ग्रह हों तो स्त्री, भाई आदि का सुख होता है।।३२।। एवं लग्नपदाद्विप्र पुत्रभावादि चिन्तयेत्। मित्रामित्रे विजानीयात्त्रिकभावेषु वै द्विज ।।३३ ।। इसी प्रकार लग्नपद से पुत्रभाव आदि का भी विचार करना चाहिए। यदि दोनों में मित्रता हो तो मित्रता, अन्यथा शत्रुता होती है।।३३।। लग्नारूढं दारपदं मिथः केन्द्रगते यदि। लाभे वा त्रित्रिकोणे वा तदा राजा धराधिपः ।। ३४ ।। लग्नपद और दारपद परस्पर केन्द्रगत, लाभ, तृतीय वा त्रिकोण में हो तो पृथ्वी का राजा होता है।।३४।। एवं दारादिभावानामर्जायित्वारिमित्रता। जातकद्वयमालोक्य चिन्तनीयं विचक्षणैः।।३५।। इसी प्रकार दारा आदि भावों के शत्रु-मित्रादि का विचार कर उनके फलों को भी कहना चाहिए।।३५।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां आरूढफलाध्यायः नवमः।