बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपपदप्रकरणम् १३५ उपपदप्रकरणम् पराशर उवाच- अधुना सम्प्रवक्ष्याम्युपपदं च द्विजोत्तम। यस्य विज्ञानमात्रेण जायते फलसूचकः॥१॥ अब मैं उपपद को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से फल का निर्णय होता है॥१॥ लग्ने विषमे विप्र धनस्य पदोपपदम्। समे लग्ने व्ययस्य च पदमुपपदं भवेत्॥२॥ लग्न यदि विषम हो तो धनभाव का पद उपपद होता है, यदि समलग्न हो तो बारहवें का पद उपपद होता है॥२॥ तदेवोपारूढगौणपदं च कथ्यते द्विज। तस्मादेव फलं सर्वं शुभाशुभं विचारयेत्॥३॥ उपपद को ही उपारूढ़ और गौणपद कहते हैं। इसी से शुभ-अशुभ फलों का विचार करना चाहिए॥३॥ पापाक्रान्ते पापयुते पापर्क्षे पापवीक्षिते। पापसम्बन्धसंयोगे उपपदाद् द्वितीयके।॥४॥ उपपद से दूसरे भाव में पापग्रह हो, पापग्रह की राशि पापग्रह से देखी जाती हो तो॥४॥ प्रव्रज्या योगो विज्ञेयः संन्यासो भवति ध्रुवम्। तथा भार्याविरोधी स्यादथवा स्त्रीविनाशकृत्॥५॥ व्रज्या (संन्यास) योग होता है। इसमें उत्पन्न बालक अवश्य संन्यासी होता है तथा स्त्री का विरोधी वा स्त्री का नाश करने वाला होता है॥५॥ रवेः पापत्वमात्रैव सिंहर्क्षे स्वोच्चभे सति। पूर्वोक्तं नो फलं ज्ञेयं जायते गृहिणीसुखम्॥६॥ यदि सूर्य सिंह राशि में वा अपनी उच्चराशि में हो तो सूर्य पापग्रह नहीं होता है। ऐसी स्थिति का सूर्य उक्त भाव में हो तो प्रव्रज्या योग नहीं होता अपितु स्त्री का सुख होता है॥६॥ मेषादिपापराशौ चेत्संस्थिते दिवसाधिपे। पूर्वोक्तं च फलं ज्ञेयं प्रव्रज्यादारनाशकः॥७॥