भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि मेषादि पापराशियों में सूर्य हो तो पूर्वोक्त फल होता है और स्त्री का नाश होता है।।७।। उपपदाच्च द्वितीयं वै शुभसम्बन्धदृष्टियुक्। शुभर्क्षे शुभसंयोगे पूर्वोक्तफलदो भवेत्।।८।। उपपद से दूसरे भाव में शुभग्रह का संबंध हो, शुभग्रह देखते हों अथवा शुभग्रह की राशि हो तो पूर्वोक्त फल होता है।।८।। उपपदे द्वितीये वा नीचांशे नीचखेटयुक्। नीचसम्बन्धयोगे वा प्रव्रज्यादारनाशकृत्।।९।। उपपद में उससे दूसरे भाव में नीचांश वा नीच राशि में नीच ग्रह युक्त हो, नीचस्थ ग्रह से संबंध होता हो तो प्रव्रज्या योग और स्त्री का नाश होता है।।९।। उच्चांशे उच्चराशौ वा उच्चसम्बन्धदृष्टियुक्। बहुदारा भवेत्तस्य रूपलक्षणसंयुताः।।१०।। यदि उच्चांश का उच्चराशि में उच्चस्थ ग्रह से संबंध और दृष्टि हो तो उसे रूपवती अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१०।। उपपदे द्वितीये वा युग्मर्क्षे संस्थिते यदा। तत्र प्रजातः पुरुषः बहुदारसमन्वितः।।११।। उपपद वा दूसरे भाव में मिथुन राशि हो तो जातक को अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।११।। उपपदे द्वितीये वा स्वस्वामिखेटसंयुते। उत्तरायुषि निर्दारो भवत्येव न संशयः।।१२।। स्वराशौ संस्थिते वापि नित्याख्ये दारकारके। उत्तरायुषि भो विप्र! निर्दारः स नरो भवेत्।।१३।। उपपद या दूसरा भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो तो आयुष्य के उत्तरार्ध में बिना स्त्री के पुरुष होता है।।१३।। उपपदेऽपि तुङ्गर्क्षे नित्याख्ये दारकारके। उत्तमकुलाद्दारलाभो नीचस्थे तु विपर्ययः।।१४।। उपपद में उच्च में नित्य स्त्रीकारक हो तो उत्तम कुल से स्त्री का लाभ होता है। नीच राशि में हो तो विपर्यय होता है।।१४।।