बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपपदप्रकरणम् १३७ शुभग्रहयुते दृष्टे उपपदे दारकारके। सुन्दरी लभ्यते भार्या भव्या रूपवती द्विज।।१५।। उपपद और स्त्रीकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हों तो बहुत सुन्दर स्त्री प्राप्त होती है।।१५।। उपपदे द्वितीये वा शनिराहुयुते सति। अपवादात्स्त्रियस्त्यागो भार्यानाशोऽथवा भवेत् ।।१६।। उपपद वा द्वितीय में शनि-राहु युत हों तो अपवाद के कारण स्त्री का त्याग या स्त्री का नाश होता है।।१६।। उपपदे च द्वितीये वा शिखिशुक्रौ स्थितौ यदा। रक्तप्रदररोगार्त्ता जायते तस्य भामिनी।।१७।। उपपद या द्वितीय में केतु-शुक्र युत हों तो स्त्री रक्तप्रदर रोग से रोगिणी होती है।।१७।। उपपदादिषु संयोगो बुधकेत्वोर्द्विजोत्तम। अस्थिस्रावयुता बाला गृहे तस्य न संशयः।।१८।। यदि बुध-केतु का संयोग हों तो अस्थिस्राव से स्त्री रोगिणी होती है।।१८।। रविराहुस्तथा पङ्गुरूपपदे योगकारकः। अस्थिज्वरवती बाला तप्ताङ्गा च दिवानिशम् ।।१९।। रवि, राहु, शनि उपपद में हों तो स्त्री अस्थिज्वर से पीड़ित होती है।।१९।। उपपदे बुधकेतुभ्यां योगसम्बन्धके द्विज। स्थूलाङ्गी गृहिणी तस्य जायते नात्र संशयः।।२०।। उपपद में बुध-केतु का योग वा संबंध हो तो उसकी स्त्री स्थूल शरीर की होती है।।२०।। उपपदे बुधक्षेत्रे भौमर्क्षे चाथवा द्विज। मन्दारौ संस्थितौ तत्र नासिकारोगयुग्भवेत् ।।२१।। उपपद में बुध की राशि या भौम की राशि हो और शनि-भौम युत हों तो स्त्री की नाक में रोग होता है।।२१।। यदि तत्र युतो सौरिः गुरुणा सहितो भवेत्। कर्णरोगवती बाला नेत्ररोगयुता तथा।।२२।।