बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गुरु-शनि का योग हो तो स्त्री कान तथा आँख के रोग वाली होती है।।२२।। कुजसौम्यौ चान्यक्षेत्रे उपपदे द्विजोत्तम। योगे स्वर्भानुदेवेज्यौ दन्तार्ता गृहिणी भवेत्।।२३।। यदि भौम-बुध वा गुरु-राहु उपपद में हों तो दाँत के रोग से पीड़ित स्त्री होती है।।२३।। उपपदे च कुम्भस्थे मीनस्थेऽपि तथा द्विज। शनिस्वर्भानुयोगश्चेत्पंग्वंगी तस्य भामिनी।।२४।। उपपद में कुम्भ या मीन राशि हो और उसमें शनि-राहु का योग हो तो उसकी स्त्री पंगुल (वातव्याधि से) होती है।।२४।। ये योगाः पूर्वकथिता मया ते विप्रसत्तम। शुभयुग्दृष्टिसंयोगे न भवेयुः फलप्रदाः।।२५।। पूर्वोक्त जो योग कहे गये हैं वे यदि शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो फलप्रद नहीं होते हैं।।२५।। लग्नादुपपदाद्वापि यो राशिः सप्तमो द्विज। तदीशात्तन्नवांशाच्च फलमेव विचारयेत्।।२६।। लग्न से वा उपपद से सातवीं राशि के जो स्वामि और उसके नवांश से भी इसी प्रकार फल का विचार करना चाहिए।।२६।। शनिः शुक्रस्तथा चान्द्रिः सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमे संस्थितो विप्र अपत्यरहितो नरः।।२७।। उक्त प्रकार से सप्तमेश से नवम में शनि, शुक्र और बुध हों तो पुरुष पुत्रहीन होता है।।२७।। पदोपपदलग्नाच्च सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमस्थे गुरौ भावौ स्वर्भानौ योगकृत्तथा।।२८।। उपपद से वा सप्तमांश ग्रह से नवमभाव में गुरु, सूर्य, राहु का योग हो तो।।२८।। बहुपुत्रो भवेन्नूनं प्रतापी बलवीर्ययुक्। प्रचण्डविजयी विप्र रिपुनिग्रहकारकः।।२९।। बड़े बलवान् पराक्रमी, प्रतापी शत्रुओं का दमन करने वाले अनेक पुत्र होते हैं।।२९।।