बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपपदप्रकरणम् १३९ उक्तस्थाने निशानाथे एकपुत्रो भवेद्द्विज। उक्तस्थाने शुभे पापे पुत्रसौख्यं विलम्बितम् ।।३०।। उक्त स्थान में चन्द्रमा हो तो एक पुत्र होता है। यदि उक्त स्थान में शुभ-पाप दोनों हों तो विलंब से पुत्र का सुख होता है।।३०।। उक्तस्थाने कुजशनिर्जायते च ह्यपुत्रवान्। परपुत्रयुतो वापि सहोढ सुतवान् भवेत् ।।३१।। उक्त स्थान में भौम-शनि हों तो पुत्रहीन होता है और दूसरे के पुत्र से (दत्तक पुत्र) पुत्रवान् होता है, वा सहोदर के पुत्र से पुत्रवाला होता है।।३२।। उक्तस्थाने चोजराशौ बहुपुत्रप्रदो भवेत्। युग्मराशौ स्थिते तत्र स्वल्पापत्यो भवेन्नरः ।।३२।। उक्त स्थान में विषम राशि हो तो बहुत पुत्र होते हैं। समराशि हो तो अल्पसंतान होते हैं।।३२।। उपपदे सिंहलग्ने निशानाथयुतेक्षिते। स्वल्पापत्यो भवेन्नूनं कन्यायां कन्यका भवेत् ।।३३।। उपपद में सिंहलग्न हो और चन्द्रमा से युत वा दृष्ट हो तो थोड़ी संतान होती है, कन्या राशि हो तो कन्या होती है।।३३।। सुतभावनवांशाच्च तथापि पुत्रकारकात्। यद्वा त्रिंशांशकुण्डल्यां तदंशाच्च सदा द्विज ।।३४।। पंचम भाव के नवांश से, पुत्रकारक से, अथवा त्रिंशांश कुण्डली वा उसके नवांश से ।।३४।। तदीशाश्चिन्तयेद्विप्र सन्ततेर्योगमुत्तमम्। एवं सर्वप्रकारेण चिन्तनीयं सदा बुधैः ।।३५।। वा उसके स्वामी से संतान भावों के उत्तम योगों का विचार करना चाहिए।।३५।। उपारूढाच्च त्र्यायस्थौ शनिराहू भ्रातृनाशदौ। एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकम् ।।३६।। उपपद से ३रे, ११वें भाव में शनि-राहु हों तो भाइयों का नाश होता है। ११वें में ज्येष्ठ भाई का और तीसरे में छोटे भाई का विचार करना चाहिए।।३६।।