बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उपपदैकादशस्थाने तृतीये दानवेज्यके । व्यवहितगर्भस्य नाशः स्याद्यथा सम्भवति द्विज ।।३७।। उपपद से ११वें, ३रे स्थान में शुक्र हो तो उससे व्यवहित गर्भ माता का नाश हो जाता है।।३७।। लग्नाद्वापि लये भावे दैत्याचार्ययुतेक्षिते। व्यवहितगर्भस्य नाशः स्यादित्युक्तं गणकोत्तमैः ।।३८।। लग्न से आठवें भाव में शुक्र युत हो वा देखता हो तो भी व्यवहित गर्भ का नाश होता है।।३८।। तृतीयैकादशे विप्र ! कुजेज्यबुधचन्द्रमाः । भ्रातृबाहुल्यता वाच्या प्रतापी बलवत्तरः ।।३९।। उपपद से ३रे, ११वें भाव में भौम, गुरु, बुध, चन्द्रमा हों तो प्रतापी बलवान् अधिक भाई होते हैं।।३९।। शन्यारसंयुते दृष्टे तृतीयैकादशे द्विज। कनिष्ठज्येष्ठयोर्नाशं भिन्नस्थे भिन्नभावहृत् ।।४०।। ३, ११ को शनि-भौम देखते हों वा युत हों तो छोटे-बड़े दोनों भाइयों का नाश होता है। भिन्न भावों में हो तो उन भावों का नाश करते हैं।।४०।। भ्रातृस्थाने युते सौरे लाभस्थे वा तृतीयगे । स्वमात्रमेव शेषः स्यादन्यं नश्यन्ति वै द्विज ।।४१।। यदि शनि ३रे वा ११वें में हो तो केवल अपने बच जाता है और सभी भाई नष्ट हो जाते हैं।।४१।। तृतीयैकादशे केतुर्बाहुल्यं स्याद्भगिन्ययोः । भ्रात्रोः स्वल्पसुखं तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।४२।। ३,११ वें भाव में केतु हो तो बहनें अधिक होती हैं और भाइयों का सुख अल्प होता है।।४२।। सप्तमेशाद्द्वितीये वै सैंहिकेययुतेक्षिते। दंष्ट्रावान् स भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो भवेत् ।।४३।। सप्तमेश से दूसरे भाव में राहु युक्त हो अथवा देखता हो तो बालक के दाँत बड़े-बड़े होते हैं और वह भाग्यशाली होता है।।४३।।