बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपपदप्रकरणम् १४१ सप्तमेशाद्द्वितीये चेत्युच्छनाथयुतेक्षिते। स्तब्धवाग् जायते बालस्तथा स्खलितवाग्द्विज ।।४४।। सप्तमेश से दूसरे भाव को केतु देखता हो वा युत हो तो बालक हकलाकर बोलने वाला होता है।।४४।। आरूढान्मृत्युभावस्थे पापाख्ये शुभवर्जिते। शुभसम्बन्धरहिते चोशे भवति निश्चितम् ।।४५।। पद से आठवें भाव में पापग्रह हों, शुभग्रह से संबंध न हो तो चोर होता है।।४५।। आरूढभावे सौम्ये तु सर्वदेशाधिपो भवेत्। सर्वज्ञस्तत्र जीवे स्यात्कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।४६।। पद में बुध हो तो चक्रवर्ती होता है, गुरु हो तो सर्वज्ञ होता है और शुक्र हो तो कवि तथा वक्ता होता है।।४६।। सप्तमे द्वादशे स्थाने सैंहिकेययुतेक्षिते। ज्ञानवांश्च भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो द्विज ।।४७।। सातवें, बारहवें भाव में राहु हो अथवा देखता हो तो बालक ज्ञानी तथा बहुत भाग्यशाली होता है।।४७।। आरूढाच्च पदाद्वापि धनस्थे शुभखेचरे। सर्वद्रव्याधिपो धीमान् जायते द्विजसत्तम ।।४८।। आरूढ़ से वा पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सम्पूर्ण द्रव्य का अधिपति और बुद्धिमान् होता है।।४८।। उपपदाद्धनपो यत्र वर्तते वित्तभे यदा। पापखेचरसंयुक्ते चौरो भवति निश्चितम् ।।४९।। उपपद से द्वितीयेश यदि धनभाव में हो और पापग्रह से संबंध करता हो तो निश्चय ही चोर होता है।।४९।। अमात्यानुचराद्विप्र देवभक्तिं विचिन्तयेत्। नीचत्वादेव नीचत्वं शुभपापाच्छुभाशुभम् ।।५०।। भ्रातृकारक से भी पूर्ववद् देवभक्ति-विचार करना चाहिए। यदि नीचग्रह का संबंध हो तो नीच देवता और शुभ-पाप के संबंध द्वारा शुभ-पाप देवता को समझना चाहिए।।५०।।