भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशे पापखगैः पापांशे पापयोगकृत्। पापवर्गे शुभैर्हीने जायते परजातकः।।५१।। कारकांश में पापग्रह, पापांश में पापग्रह से योग करते हुए पापग्रह के वर्ग में हों, शुभग्रह का सम्बन्ध न हो तो दूसरे से उत्पन्न हुआ होता है।।५१।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां उपपदफलं नाम दशमोऽध्यायः। अथ कारकमारकविचाराध्यायः पञ्चमं नवमं चैव विशेषधनमुच्यते। चतुर्थं दशमं चैव विशेषसुखमुच्यते।।१।। पाँचवाँ और नवम स्थान विशेष धनस्थान होता है और चौथा तथा दशम विशेष सुखस्थान होता है।।१।। चन्द्रभानू विना सर्वे मारके मारकाधिपाः। षष्ठाष्टमव्ययेशास्तु राहुः केतुस्तथैव च।।२।। चन्द्रमा-सूर्य को छोड़कर शेष सभी ग्रह मारकेश होते हैं। छठा, आठवाँ, बारहवाँ स्थान के स्वामी और राहु तथा केतु ये सभी मारकेश होते हैं।।२।। केन्द्राधिपतयः सौम्याः शुभं नैव दिशन्ति च। क्रूराः नैवाशुभं कुर्युः कोणपौ शुभदायकौ।।३।। यदि शुभग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो शुभ फल नहीं देते हैं। पापग्रह केन्द्राधिपति हों तो अशुभ फल नहीं देते हैं। यदि कोण (९/५) के स्वामी हों तो शुभफल देते हैं।।३।। धनेशो हि व्ययेशश्च संयोगात्फलदौ मताः। लाभारित्र्यधिपा पापा रन्ध्रेशो न शुभप्रदः।।४।। द्वितीयेश और व्ययेश संयोगवश (साहचर्य) फल देते हैं। ११/६/३भावों के स्वामी पाप होते हैं। अष्टमेश शुभद नहीं होता है।।४।। जायाकुटुम्बकाधीशौ मारकौ परिकीर्त्तितौ। क्रूराश्चैते ग्रहा ज्ञेया क्षीणचन्द्रो रविस्तथा।।५।। सप्तम और दूसरे भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। क्षीणचन्द्र और रवि क्रूर ग्रह हैं।।५।।