बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकारकमारकविचाराध्यायः १४३ शनिर्भौमश्च विज्ञेया प्रबला ह्युत्तरोत्तराः। लग्नाम्बुद्यूनकर्माणि प्रबलान्युत्तराणि हि॥६॥ शनि, भौम ये क्रूर ग्रह कहे जाते हैं और उत्तरोत्तर प्रबल होते हैं। लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम ये उत्तरोत्तर प्रबल होते हैं॥६॥ सुतधर्मौ तथा ख्यातौ प्रबलौ चोत्तरोत्तरौ। लाभारित्रितयस्थानं त्वधोधः प्रबलं भवेत्॥७॥ पंचम और नवम उत्तरोत्तर प्रबलं होते हैं। ११/६/३ स्थान क्रमशः प्रबल होते हैं॥७॥ पुनर्मारकयोर्मध्ये ह्युत्तरं प्रबलं मतम्। भाग्यस्थानाद्व्ययं विप्र तस्माच्चैवाशुभं वदेत्॥८॥ मारकों के मध्य में द्वितीयेश प्रबल मारक होता है। भाग्यस्थान से व्ययस्थान (अष्टम) से भी अशुभ फल होता है॥८॥ एतत्स्थानानुसारेण ग्रहाणां मानमालिखेत्। चन्द्रज्ञगुरुशुक्राणां केन्द्रदोषो यथोत्तरम्॥९॥ इस प्रकार ग्रहों की शुभ-अशुभ फलों की तालिका लिखकर फल का विचार करें। चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र का केन्द्रदोष यथोत्तर बलवान् होता है॥९॥ तथैव ग्रहाः क्रूरां प्रबलाश्चैवोत्तरोत्तरम्। भाग्येशः सर्वदा सौम्यो न क्रूरः फलदायकः॥१०॥ उसी प्रकार उसमें स्थित ग्रह भी यथोत्तर बली होते हैं। भाग्येश सर्वदा शुभफल देने वाला होता है, किन्तु क्रूरग्रह हो तो शुभ फलदायक नहीं होता है॥१०॥ पुत्राधिपोऽपि शुभदः क्रूरोऽपि सुखदः स्मृतः। त्रिलाभरिपुमृत्यूनां पतयो दुःखदायकाः॥११॥ पंचमेश शुभग्रह हो या पापग्रह हो शुभफल ही देता है। ३/११/६/ ८ के अधिपति दुःखदायी होते हैं॥११॥ यद्यद्भावगतो राहुः केतुश्च जनने नृणाम्। यद्यद्भावेशसंयुक्तस्तत्फलं प्रदिशेदलम्॥१२॥ राह-केतु जिन-जिन भावों में हों, जिन-जिन भावेशों से युत हों उनके अनुसार फल को देते हैं॥१२॥