बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मेषलग्ने शुभाशुभदायकौ- मन्दसौम्यसिताः पापाः शुभौ गुरुदिवाकरौ । न शुभं योगमात्रेण प्रभवेच्छनिजीवयोः ॥ १३ ॥ मेष लग्न में उत्पन्न बालक को शनि, बुध, शुक्र पापफल देने वाले और गुरु-सूर्य शुभफल देनेवाले होते हैं। शनि-गुरु योग मात्र से शुभदायक नहीं होते किन्तु सहायक होते हैं॥१३॥ परतन्त्रेण जीवस्य पापकर्माणि निश्चितम् । कविः साक्षान्निहन्ता स्यान्मारकत्वेन लक्षितः ॥ १४ ॥ गुरु के पारतन्त्र्य होने से (व्ययेश होने के कारण-पापसंबंध से) पीपफल देना भी निश्चित है। शुक्र साक्षात् मारकेश होता है॥१४॥ मन्दादयो निहन्तारो भवेयुः पापिनो ग्रहाः। शुभाशुभफलान्येवं ज्ञातव्यानि क्रियोद्भवैः ॥ १५ ॥ शनि आदि पापग्रह भी मारकेश के सहयोग से मारक होते हैं। इस प्रकार मेषलग्न में उत्पन्न जातक के शुभ-अशुभ का निर्णय करना चाहिए।॥१५॥ विशेष-यहाँ मेषलग्न के स्वामी भौम अष्टमेश होने के कारण अशुभ है। किन्तु लग्नेश होने के कारण शुभ फल देने वाले के सहायक हैं। शनि केन्द्राधिपति होने के कारण शुभद है, किन्तु लाभाधिपति होने के कारण पापी हो गया। बुध ३/६ भाव का अधिपति होने के कारण अशुभ, शुक्र मारकस्थान (२/७) का स्वामी यानि केन्द्रेश होने के कारण अशुभ, सूर्य (५) का स्वामी होने से शुभ, गुरु व्ययेश और भाग्येश होने के कारण अपने सहयोगी के अनुसार पापफलद भी हो सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक लग्नों में समझना चाहिए। वृषलग्नम्- जीवशुक्रेन्दवः पापाः शुभौ शनिदिवाकरौ । राजयोगकरः साक्षादेक एव रवेः सुतः॥१६॥ वृष लग्न वाले को गुरु, शुक्र, चन्द्रमा पापफल देने वाले, शनि-सूर्य शुभ फलदायक और राजयोगकारक होते हैं।॥१६॥ जीवादयो ग्रहाः पापाः सन्ति मारकलक्षणाः । बुधः स्वल्पफलान्येवं ज्ञेयानि वृषजन्मनः ॥१७॥