बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
उपपदप्रकरणम् १३७ शुभग्रहयुते दृष्टे उपपदे दारकारके। सुन्दरी लभ्यते भार्या भव्या रूपवती द्विज।।१५।। उपपद और स्त्रीकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हों तो बहुत सुन्दर स्त्री प्राप्त होती है।।१५।। उपपदे द्वितीये वा शनिराहुयुते सति। अपवादात्स्त्रियस्त्यागो भार्यानाशोऽथवा भवेत् ।।१६।। उपपद वा द्वितीय में शनि-राहु युत हों तो अपवाद के कारण स्त्री का त्याग या स्त्री का नाश होता है।।१६।। उपपदे च द्वितीये वा शिखिशुक्रौ स्थितौ यदा। रक्तप्रदररोगार्त्ता जायते तस्य भामिनी।।१७।। उपपद या द्वितीय में केतु-शुक्र युत हों तो स्त्री रक्तप्रदर रोग से रोगिणी होती है।।१७।। उपपदादिषु संयोगो बुधकेत्वोर्द्विजोत्तम। अस्थिस्रावयुता बाला गृहे तस्य न संशयः।।१८।। यदि बुध-केतु का संयोग हों तो अस्थिस्राव से स्त्री रोगिणी होती है।।१८।। रविराहुस्तथा पङ्गुरूपपदे योगकारकः। अस्थिज्वरवती बाला तप्ताङ्गा च दिवानिशम् ।।१९।। रवि, राहु, शनि उपपद में हों तो स्त्री अस्थिज्वर से पीड़ित होती है।।१९।। उपपदे बुधकेतुभ्यां योगसम्बन्धके द्विज। स्थूलाङ्गी गृहिणी तस्य जायते नात्र संशयः।।२०।। उपपद में बुध-केतु का योग वा संबंध हो तो उसकी स्त्री स्थूल शरीर की होती है।।२०।। उपपदे बुधक्षेत्रे भौमर्क्षे चाथवा द्विज। मन्दारौ संस्थितौ तत्र नासिकारोगयुग्भवेत् ।।२१।। उपपद में बुध की राशि या भौम की राशि हो और शनि-भौम युत हों तो स्त्री की नाक में रोग होता है।।२१।। यदि तत्र युतो सौरिः गुरुणा सहितो भवेत्। कर्णरोगवती बाला नेत्ररोगयुता तथा।।२२।।
१३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गुरु-शनि का योग हो तो स्त्री कान तथा आँख के रोग वाली होती है।।२२।। कुजसौम्यौ चान्यक्षेत्रे उपपदे द्विजोत्तम। योगे स्वर्भानुदेवेज्यौ दन्तार्ता गृहिणी भवेत्।।२३।। यदि भौम-बुध वा गुरु-राहु उपपद में हों तो दाँत के रोग से पीड़ित स्त्री होती है।।२३।। उपपदे च कुम्भस्थे मीनस्थेऽपि तथा द्विज। शनिस्वर्भानुयोगश्चेत्पंग्वंगी तस्य भामिनी।।२४।। उपपद में कुम्भ या मीन राशि हो और उसमें शनि-राहु का योग हो तो उसकी स्त्री पंगुल (वातव्याधि से) होती है।।२४।। ये योगाः पूर्वकथिता मया ते विप्रसत्तम। शुभयुग्दृष्टिसंयोगे न भवेयुः फलप्रदाः।।२५।। पूर्वोक्त जो योग कहे गये हैं वे यदि शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो फलप्रद नहीं होते हैं।।२५।। लग्नादुपपदाद्वापि यो राशिः सप्तमो द्विज। तदीशात्तन्नवांशाच्च फलमेव विचारयेत्।।२६।। लग्न से वा उपपद से सातवीं राशि के जो स्वामि और उसके नवांश से भी इसी प्रकार फल का विचार करना चाहिए।।२६।। शनिः शुक्रस्तथा चान्द्रिः सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमे संस्थितो विप्र अपत्यरहितो नरः।।२७।। उक्त प्रकार से सप्तमेश से नवम में शनि, शुक्र और बुध हों तो पुरुष पुत्रहीन होता है।।२७।। पदोपपदलग्नाच्च सप्तमांशग्रहेभ्यश्च। नवमस्थे गुरौ भावौ स्वर्भानौ योगकृत्तथा।।२८।। उपपद से वा सप्तमांश ग्रह से नवमभाव में गुरु, सूर्य, राहु का योग हो तो।।२८।। बहुपुत्रो भवेन्नूनं प्रतापी बलवीर्ययुक्। प्रचण्डविजयी विप्र रिपुनिग्रहकारकः।।२९।। बड़े बलवान् पराक्रमी, प्रतापी शत्रुओं का दमन करने वाले अनेक पुत्र होते हैं।।२९।।
उपपदप्रकरणम् १३९ उक्तस्थाने निशानाथे एकपुत्रो भवेद्द्विज। उक्तस्थाने शुभे पापे पुत्रसौख्यं विलम्बितम् ।।३०।। उक्त स्थान में चन्द्रमा हो तो एक पुत्र होता है। यदि उक्त स्थान में शुभ-पाप दोनों हों तो विलंब से पुत्र का सुख होता है।।३०।। उक्तस्थाने कुजशनिर्जायते च ह्यपुत्रवान्। परपुत्रयुतो वापि सहोढ सुतवान् भवेत् ।।३१।। उक्त स्थान में भौम-शनि हों तो पुत्रहीन होता है और दूसरे के पुत्र से (दत्तक पुत्र) पुत्रवान् होता है, वा सहोदर के पुत्र से पुत्रवाला होता है।।३२।। उक्तस्थाने चोजराशौ बहुपुत्रप्रदो भवेत्। युग्मराशौ स्थिते तत्र स्वल्पापत्यो भवेन्नरः ।।३२।। उक्त स्थान में विषम राशि हो तो बहुत पुत्र होते हैं। समराशि हो तो अल्पसंतान होते हैं।।३२।। उपपदे सिंहलग्ने निशानाथयुतेक्षिते। स्वल्पापत्यो भवेन्नूनं कन्यायां कन्यका भवेत् ।।३३।। उपपद में सिंहलग्न हो और चन्द्रमा से युत वा दृष्ट हो तो थोड़ी संतान होती है, कन्या राशि हो तो कन्या होती है।।३३।। सुतभावनवांशाच्च तथापि पुत्रकारकात्। यद्वा त्रिंशांशकुण्डल्यां तदंशाच्च सदा द्विज ।।३४।। पंचम भाव के नवांश से, पुत्रकारक से, अथवा त्रिंशांश कुण्डली वा उसके नवांश से ।।३४।। तदीशाश्चिन्तयेद्विप्र सन्ततेर्योगमुत्तमम्। एवं सर्वप्रकारेण चिन्तनीयं सदा बुधैः ।।३५।। वा उसके स्वामी से संतान भावों के उत्तम योगों का विचार करना चाहिए।।३५।। उपारूढाच्च त्र्यायस्थौ शनिराहू भ्रातृनाशदौ। एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकम् ।।३६।। उपपद से ३रे, ११वें भाव में शनि-राहु हों तो भाइयों का नाश होता है। ११वें में ज्येष्ठ भाई का और तीसरे में छोटे भाई का विचार करना चाहिए।।३६।।
१४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् उपपदैकादशस्थाने तृतीये दानवेज्यके । व्यवहितगर्भस्य नाशः स्याद्यथा सम्भवति द्विज ।।३७।। उपपद से ११वें, ३रे स्थान में शुक्र हो तो उससे व्यवहित गर्भ माता का नाश हो जाता है।।३७।। लग्नाद्वापि लये भावे दैत्याचार्ययुतेक्षिते। व्यवहितगर्भस्य नाशः स्यादित्युक्तं गणकोत्तमैः ।।३८।। लग्न से आठवें भाव में शुक्र युत हो वा देखता हो तो भी व्यवहित गर्भ का नाश होता है।।३८।। तृतीयैकादशे विप्र ! कुजेज्यबुधचन्द्रमाः । भ्रातृबाहुल्यता वाच्या प्रतापी बलवत्तरः ।।३९।। उपपद से ३रे, ११वें भाव में भौम, गुरु, बुध, चन्द्रमा हों तो प्रतापी बलवान् अधिक भाई होते हैं।।३९।। शन्यारसंयुते दृष्टे तृतीयैकादशे द्विज। कनिष्ठज्येष्ठयोर्नाशं भिन्नस्थे भिन्नभावहृत् ।।४०।। ३, ११ को शनि-भौम देखते हों वा युत हों तो छोटे-बड़े दोनों भाइयों का नाश होता है। भिन्न भावों में हो तो उन भावों का नाश करते हैं।।४०।। भ्रातृस्थाने युते सौरे लाभस्थे वा तृतीयगे । स्वमात्रमेव शेषः स्यादन्यं नश्यन्ति वै द्विज ।।४१।। यदि शनि ३रे वा ११वें में हो तो केवल अपने बच जाता है और सभी भाई नष्ट हो जाते हैं।।४१।। तृतीयैकादशे केतुर्बाहुल्यं स्याद्भगिन्ययोः । भ्रात्रोः स्वल्पसुखं तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।४२।। ३,११ वें भाव में केतु हो तो बहनें अधिक होती हैं और भाइयों का सुख अल्प होता है।।४२।। सप्तमेशाद्द्वितीये वै सैंहिकेययुतेक्षिते। दंष्ट्रावान् स भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो भवेत् ।।४३।। सप्तमेश से दूसरे भाव में राहु युक्त हो अथवा देखता हो तो बालक के दाँत बड़े-बड़े होते हैं और वह भाग्यशाली होता है।।४३।।
उपपदप्रकरणम् १४१ सप्तमेशाद्द्वितीये चेत्युच्छनाथयुतेक्षिते। स्तब्धवाग् जायते बालस्तथा स्खलितवाग्द्विज ।।४४।। सप्तमेश से दूसरे भाव को केतु देखता हो वा युत हो तो बालक हकलाकर बोलने वाला होता है।।४४।। आरूढान्मृत्युभावस्थे पापाख्ये शुभवर्जिते। शुभसम्बन्धरहिते चोशे भवति निश्चितम् ।।४५।। पद से आठवें भाव में पापग्रह हों, शुभग्रह से संबंध न हो तो चोर होता है।।४५।। आरूढभावे सौम्ये तु सर्वदेशाधिपो भवेत्। सर्वज्ञस्तत्र जीवे स्यात्कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।४६।। पद में बुध हो तो चक्रवर्ती होता है, गुरु हो तो सर्वज्ञ होता है और शुक्र हो तो कवि तथा वक्ता होता है।।४६।। सप्तमे द्वादशे स्थाने सैंहिकेययुतेक्षिते। ज्ञानवांश्च भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो द्विज ।।४७।। सातवें, बारहवें भाव में राहु हो अथवा देखता हो तो बालक ज्ञानी तथा बहुत भाग्यशाली होता है।।४७।। आरूढाच्च पदाद्वापि धनस्थे शुभखेचरे। सर्वद्रव्याधिपो धीमान् जायते द्विजसत्तम ।।४८।। आरूढ़ से वा पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सम्पूर्ण द्रव्य का अधिपति और बुद्धिमान् होता है।।४८।। उपपदाद्धनपो यत्र वर्तते वित्तभे यदा। पापखेचरसंयुक्ते चौरो भवति निश्चितम् ।।४९।। उपपद से द्वितीयेश यदि धनभाव में हो और पापग्रह से संबंध करता हो तो निश्चय ही चोर होता है।।४९।। अमात्यानुचराद्विप्र देवभक्तिं विचिन्तयेत्। नीचत्वादेव नीचत्वं शुभपापाच्छुभाशुभम् ।।५०।। भ्रातृकारक से भी पूर्ववद् देवभक्ति-विचार करना चाहिए। यदि नीचग्रह का संबंध हो तो नीच देवता और शुभ-पाप के संबंध द्वारा शुभ-पाप देवता को समझना चाहिए।।५०।।
१४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कारकांशे पापखगैः पापांशे पापयोगकृत्। पापवर्गे शुभैर्हीने जायते परजातकः।।५१।। कारकांश में पापग्रह, पापांश में पापग्रह से योग करते हुए पापग्रह के वर्ग में हों, शुभग्रह का सम्बन्ध न हो तो दूसरे से उत्पन्न हुआ होता है।।५१।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां उपपदफलं नाम दशमोऽध्यायः। अथ कारकमारकविचाराध्यायः पञ्चमं नवमं चैव विशेषधनमुच्यते। चतुर्थं दशमं चैव विशेषसुखमुच्यते।।१।। पाँचवाँ और नवम स्थान विशेष धनस्थान होता है और चौथा तथा दशम विशेष सुखस्थान होता है।।१।। चन्द्रभानू विना सर्वे मारके मारकाधिपाः। षष्ठाष्टमव्ययेशास्तु राहुः केतुस्तथैव च।।२।। चन्द्रमा-सूर्य को छोड़कर शेष सभी ग्रह मारकेश होते हैं। छठा, आठवाँ, बारहवाँ स्थान के स्वामी और राहु तथा केतु ये सभी मारकेश होते हैं।।२।। केन्द्राधिपतयः सौम्याः शुभं नैव दिशन्ति च। क्रूराः नैवाशुभं कुर्युः कोणपौ शुभदायकौ।।३।। यदि शुभग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो शुभ फल नहीं देते हैं। पापग्रह केन्द्राधिपति हों तो अशुभ फल नहीं देते हैं। यदि कोण (९/५) के स्वामी हों तो शुभफल देते हैं।।३।। धनेशो हि व्ययेशश्च संयोगात्फलदौ मताः। लाभारित्र्यधिपा पापा रन्ध्रेशो न शुभप्रदः।।४।। द्वितीयेश और व्ययेश संयोगवश (साहचर्य) फल देते हैं। ११/६/३भावों के स्वामी पाप होते हैं। अष्टमेश शुभद नहीं होता है।।४।। जायाकुटुम्बकाधीशौ मारकौ परिकीर्त्तितौ। क्रूराश्चैते ग्रहा ज्ञेया क्षीणचन्द्रो रविस्तथा।।५।। सप्तम और दूसरे भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। क्षीणचन्द्र और रवि क्रूर ग्रह हैं।।५।।
कारकमारकविचाराध्यायः १४३ शनिर्भौमश्च विज्ञेया प्रबला ह्युत्तरोत्तराः। लग्नाम्बुद्यूनकर्माणि प्रबलान्युत्तराणि हि॥६॥ शनि, भौम ये क्रूर ग्रह कहे जाते हैं और उत्तरोत्तर प्रबल होते हैं। लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम ये उत्तरोत्तर प्रबल होते हैं॥६॥ सुतधर्मौ तथा ख्यातौ प्रबलौ चोत्तरोत्तरौ। लाभारित्रितयस्थानं त्वधोधः प्रबलं भवेत्॥७॥ पंचम और नवम उत्तरोत्तर प्रबलं होते हैं। ११/६/३ स्थान क्रमशः प्रबल होते हैं॥७॥ पुनर्मारकयोर्मध्ये ह्युत्तरं प्रबलं मतम्। भाग्यस्थानाद्व्ययं विप्र तस्माच्चैवाशुभं वदेत्॥८॥ मारकों के मध्य में द्वितीयेश प्रबल मारक होता है। भाग्यस्थान से व्ययस्थान (अष्टम) से भी अशुभ फल होता है॥८॥ एतत्स्थानानुसारेण ग्रहाणां मानमालिखेत्। चन्द्रज्ञगुरुशुक्राणां केन्द्रदोषो यथोत्तरम्॥९॥ इस प्रकार ग्रहों की शुभ-अशुभ फलों की तालिका लिखकर फल का विचार करें। चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र का केन्द्रदोष यथोत्तर बलवान् होता है॥९॥ तथैव ग्रहाः क्रूरां प्रबलाश्चैवोत्तरोत्तरम्। भाग्येशः सर्वदा सौम्यो न क्रूरः फलदायकः॥१०॥ उसी प्रकार उसमें स्थित ग्रह भी यथोत्तर बली होते हैं। भाग्येश सर्वदा शुभफल देने वाला होता है, किन्तु क्रूरग्रह हो तो शुभ फलदायक नहीं होता है॥१०॥ पुत्राधिपोऽपि शुभदः क्रूरोऽपि सुखदः स्मृतः। त्रिलाभरिपुमृत्यूनां पतयो दुःखदायकाः॥११॥ पंचमेश शुभग्रह हो या पापग्रह हो शुभफल ही देता है। ३/११/६/ ८ के अधिपति दुःखदायी होते हैं॥११॥ यद्यद्भावगतो राहुः केतुश्च जनने नृणाम्। यद्यद्भावेशसंयुक्तस्तत्फलं प्रदिशेदलम्॥१२॥ राह-केतु जिन-जिन भावों में हों, जिन-जिन भावेशों से युत हों उनके अनुसार फल को देते हैं॥१२॥
१४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मेषलग्ने शुभाशुभदायकौ- मन्दसौम्यसिताः पापाः शुभौ गुरुदिवाकरौ । न शुभं योगमात्रेण प्रभवेच्छनिजीवयोः ॥ १३ ॥ मेष लग्न में उत्पन्न बालक को शनि, बुध, शुक्र पापफल देने वाले और गुरु-सूर्य शुभफल देनेवाले होते हैं। शनि-गुरु योग मात्र से शुभदायक नहीं होते किन्तु सहायक होते हैं॥१३॥ परतन्त्रेण जीवस्य पापकर्माणि निश्चितम् । कविः साक्षान्निहन्ता स्यान्मारकत्वेन लक्षितः ॥ १४ ॥ गुरु के पारतन्त्र्य होने से (व्ययेश होने के कारण-पापसंबंध से) पीपफल देना भी निश्चित है। शुक्र साक्षात् मारकेश होता है॥१४॥ मन्दादयो निहन्तारो भवेयुः पापिनो ग्रहाः। शुभाशुभफलान्येवं ज्ञातव्यानि क्रियोद्भवैः ॥ १५ ॥ शनि आदि पापग्रह भी मारकेश के सहयोग से मारक होते हैं। इस प्रकार मेषलग्न में उत्पन्न जातक के शुभ-अशुभ का निर्णय करना चाहिए।॥१५॥ विशेष-यहाँ मेषलग्न के स्वामी भौम अष्टमेश होने के कारण अशुभ है। किन्तु लग्नेश होने के कारण शुभ फल देने वाले के सहायक हैं। शनि केन्द्राधिपति होने के कारण शुभद है, किन्तु लाभाधिपति होने के कारण पापी हो गया। बुध ३/६ भाव का अधिपति होने के कारण अशुभ, शुक्र मारकस्थान (२/७) का स्वामी यानि केन्द्रेश होने के कारण अशुभ, सूर्य (५) का स्वामी होने से शुभ, गुरु व्ययेश और भाग्येश होने के कारण अपने सहयोगी के अनुसार पापफलद भी हो सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक लग्नों में समझना चाहिए। वृषलग्नम्- जीवशुक्रेन्दवः पापाः शुभौ शनिदिवाकरौ । राजयोगकरः साक्षादेक एव रवेः सुतः॥१६॥ वृष लग्न वाले को गुरु, शुक्र, चन्द्रमा पापफल देने वाले, शनि-सूर्य शुभ फलदायक और राजयोगकारक होते हैं।॥१६॥ जीवादयो ग्रहाः पापाः सन्ति मारकलक्षणाः । बुधः स्वल्पफलान्येवं ज्ञेयानि वृषजन्मनः ॥१७॥
कारकमारकविचाराध्यायः १४५ गुरु, शुक्र, चन्द्रमा ये पापफलदायक मारकेश के फल को देने वाले होते हैं और बुध अल्प शुभफल को देने वाला होता है। ऐसा लक्षण वृषलग्न वालों का होता है॥१७॥ मिथुनलग्नम्— भौमजीवारुणः पापा एक एव कविः शुभः। शनैश्चरेण जीवस्य योगो मेषभवो यथा॥१८॥ मिथुन लग्नवाले को भौम, गुरु, सूर्य पापफल देने वाले, केवल एक मात्र शुक्र शुभफल देने वाला होता है। शनि-गुरु का योग मेषलग्न वाले के समान ही फलदायक होता है॥१८॥ नायं शशी निहन्ता स्याल्लक्षणं पापनिष्फलम्। ज्ञातव्यानि द्वन्द्वजस्य फलान्येतानि सूरिभिः॥१९॥ चन्द्रमा मारक नहीं होता है किन्तु साहचर्यानुसार फल देने वाला होता है। इस प्रकार मिथुन लग्न वालों के फल का विचार करना चाहिए॥१९॥ कर्कलग्नम्— भार्गवेन्दुसुतौ पापौ भौमेज्यशशिनः शुभाः। एकग्रहस्तु भवेत्साक्षान्महीसुतो योगकारकः॥२०॥ कर्क लग्नवाले को शुक्र-बुध पाप फल देने वाले और भौम, गुरु, चन्द्रमा शुभ फल देने वाले होते हैं। केवल एक भौम ही राजयोगकारक होता है॥२०॥ निहन्ता रविजोऽन्ये च साहचर्यात्फलप्रदाः। कुलीरसम्भवस्यैव फलान्युक्तानि सूरिभिः॥२१॥ शनि मारकेश होता है, अन्य ग्रह साहचर्य के अनुसार फल देते हैं। ऐसा कर्क लग्न वाले का फल होता है॥२१॥ अथ सिंहलग्नम्— बुधशुक्रार्कजाः पापाः भौमेज्यार्काः शुभप्रदाः। प्रभवेद्योगमात्रेण न शुभं गुरुशुक्रयोः॥२२॥ सिंह लग्नवाले को बुध, शुक्र, शनि पापफल देने वाले और भौम, गुरु, सूर्य शुभ फल देने वाले होते हैं। गुरु-शुक्र के योगमात्र से शुभफल नहीं होता है॥२२॥
१४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् घ्नन्ति सौम्यादयः पापा मारकत्वेन लक्षिताः। एवं फलानि वेद्यानि सिंहे यस्य जनुर्भवेत् ॥२३॥ बुध पापग्रहों के साहचर्य से मारकेश होता है। ऐसा सिंहलग्न वालों का फल होता है।।२३।। अथ कन्यालग्नम्- कुजजीवेन्दवः पापा एक एव भृगुः शुभः। भार्गवेन्दुसुतावेव भवेतां योगकारको ॥२४॥ कन्या लग्नवाले को भौम, गुरु, चन्द्रमा पापफल देने वाले, केवल शुक्र ही शुभफलदायक है। शुक्र-बुध योगकारक होते हैं।।२४।। निहन्ता कविरन्ये तु मारकास्तु कुजादयः। प्रतीक्षते फलान्युक्तान्येवं कन्याभवे बुधैः ॥२५॥ मारकेश शुक्र ही होता है, अन्य भौम आदि मारकेश के साहचर्य से फल देते हैं। यह कन्यालग्न का फल है।।२५।। अथ तुलालग्नम्- जीवार्कमहीजाः पापाः शनैश्चरबुधौ शुभौ। भवेतां राजयोगस्य कारकौ चन्द्रतत्सुतौ ॥२६॥ तुलालग्न वाले को गुरु, सूर्य, भौम पापफल देनेवाले, शनि-बुध शुभफलदाता, चंद्रमा-बुध राजयोगकारक होते हैं।।२६।। कुजो निहन्ति जीवाद्याः परे मारकलक्षणाः। निहन्तारः फलान्येवं काव्यो न तु तुलाभवः ॥२७॥ भौम मारकेश होता है, गुरु आदि अन्य ग्रह, जो मारकेश के लक्षण के हैं, वे अनिष्टकारक और शुक्र समफलदाता होता है; ऐसा तुलालग्न का फल जानना चाहिए।।२७।। अथ वृश्चिकलग्नम्- सौम्यभौमसिताः पापाः शुभौ गुरुनिशाकरौ। सूर्यचन्द्रमसावेव भवेतां योगकारको ॥२८॥ वृश्चिक लग्नवाले को बुध, भौम, शुक्र पाप फल देने वाले, गुरु-चंद्रमा शुभ फल देने वाले और सूर्य-चंद्रमा योगकारक होते हैं।।२८।। जीवो निहन्ता सौम्याद्या हन्तारो मारकाह्वयाः। तत्तत्फलानि विज्ञान्येवं वृश्चिकजन्मनः ॥२९॥
कारकमारकविचाराध्यायः १४७ गुरु मारकेश होता है, बुध आदि मारक के समान ही फलदाता होते हैं। ऐसा वृश्चिक लग्न वाले का फल होता है।।२९।। अथ धनुर्लग्नम्- एक एव कविः पापः शुभौ सौम्यदिवाकरौ। योगो भास्करसौम्याभ्यां निहन्ता भास्करःसुतः।।३०।। धनुलग्नवाले को शुक्र पाप फल देने वाला, बुध-सूर्य शुभफल देने वाले, सूर्य-बुध का योग राजयोगकारक होता है।।३०।। घ्नन्ति शुक्रादयः पापा मारकत्वेन लक्षिताः। ज्ञातव्यानि फलान्येवं चापजस्य मनीषिभिः।।३१।। शनि मारकेश होता है, शुक्र आदि मारकेश के समान ही पापफल देने वाले होते हैं; ऐसा धन लग्न का फल होतां है।।३१।। अथ मकरलग्नम्- कुजजीवेन्दवः पापाः शुभौ भार्गवचन्द्रजौ। स्वयं चैव निहन्ता स्यान्मन्दो भौमादयः परे।।३२।। मकर लग्न वाले को भौम, गुरु, चंद्रमा पाप फल देने वाले शुक्र और चंद्रमा शुभफल देने वाले, शनि मारकेश होता है। भौम आदि मारकेश के लक्षण के समान होने से मारक होते हैं।।३२।' तल्लक्षणानि हन्तारः कविरेकः सुयोगकृत्। ज्ञातव्यानि फलान्येवं विबुधैर्मृगजन्मनः।।३३।। शुक्र योगकारक होता है। इस प्रकार का फल मकर लग्न का होता है।।३३।। अथ कुम्भलग्नम्- जीवचन्द्रकुजाः पापा एको दैत्यगुरुः शुभः। राजयोगकरः शुक्रो भौमश्चैव बृहस्पतिः।।३४।। कुंभ लग्न वाले को गुरु, चंद्रमा, भौम पापफल देने वाले और शुक्र केवल राजयोग कारक होता है।।३४।। निहन्ता सन्ति भौमाद्या मारकत्वेन लक्षिताः। एवमेव फलान्यूह्यान्येतानि घटजन्मनः।।३५।। भौम-गुरु मारकेश होते हैं, अन्य ग्रह भी मारकेश से संबंध होने से उनके फलों को देते हैं।।३५।।
१४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मीनलग्नम्— मन्दशुक्रांशुमद् पापाः सौम्यो भौमविधू शुभौ। महीसुतगुरुश्चैव भवेतां योगकारको ॥३६॥ मीनलग्न वाले को शनि, शुक्र, सूर्य पाप फल देनेवाले, बुध, भौम, चंद्रमा शुभफलदायक और भौम-गुरु राजयोगकारक होते हैं ॥३६॥ भौमः मारकत्वेऽपि न हन्तामन्दज्ञौ पापिनः । इत्यूहानि फलान्येवं बुधैस्तु झषजन्मनः ॥३७॥ भौम मारकेश होते हुए भी मारता नहीं है, किन्तु शनि-बुध मारक होते हैं। इस प्रकार मीनलग्न का फल जानना चाहिए ॥३७॥ एतच्छास्त्रानुसारेण मारकान्निर्दिशेद् बुधः। चन्द्रसूर्य विना सर्वे मारकाः परिकीर्त्तिताः ॥३८॥ इस शास्त्र के अनुसार मारकेश का निर्देश करना चाहिए। रवि-चंद्र को छोड़कर शेष सभी मारकेश होते हैं ॥३८॥ स्वदशायां स्वमुक्तौ च नराणां निधनं न हि। क्वचिद्दशायामिच्छन्ति स्वभुक्तौ न कदाचन ॥३९॥ मारकेश की दशा और अन्तर्दशा में मृत्यु नहीं होती है। किसी- किसी के मत से मारकेश की दशा में मृत्यु होती है और कभी अंतर्दशा में नहीं होती है। ॥३९॥ इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां कारकमारकादिविचारो नामैकादशोऽध्यायः। अथ द्वादशभावेषु विचार्यत्वमाह तनोरूपं च ज्ञानं च वर्णं चैव बलाबलम्। शीलं वै प्रकृतिं चैव तनुस्थानाद्विचारयेत् ॥१॥ प्रथम भाव से शरीर, रूप (रंग), ज्ञान, वर्ण (ब्राह्मणादि), बल, निर्बल, शील(स्वभाव) और प्रकृति का विचार करना चाहिए ॥१॥ धनं धान्यं कुटुम्बं च मृत्युजालममित्रकम्। धातुरत्नादिकं सर्वं धनस्थानाद्विचारयेत् ॥२॥
द्वादशभावविचाराध्यायः १४९ दूसरे भाव में धन, धान्य, कुटुंब, मृत्यु, शत्रु का और धातु, रत्न आदि का विचार करना चाहिए॥२॥ विक्रमं भृत्यभ्रात्रादि चोपदेशप्रयाणकम्। पित्रोर्वे मरणं विप्र दुश्चिक्याच्च निरीक्षयेत् ॥३॥ तीसरे भाव में नौकर, भाई, उपदेश, यात्रा और पिता के मरण का विचार करना चाहिए॥३॥ वाहनस्याथ बन्धूनां मातृसौख्यादिकानपि। निधिक्षेत्रं गृहं चापि पातालाच्च निरीक्षयेत् ॥४॥ चौथे भाव से वाहन (सवारी) का, बंधुओं का, मातृसुख का, निधि (गड़े धन) का, क्षेत्र (खेत) तथा गृह का विचार करना चाहिए॥४॥ यन्त्रमन्त्रौ तथा विद्या बुद्धेश्चैव प्रबन्धकम्। पुत्रराज्यापभ्रंशादि पश्येत्पुत्रालयाद् बुधः॥५॥ पाँचवें भाव से यंत्र, मंत्र, विद्या, बुद्धि, प्रबंध, पुत्र और राज्य के स्खलन का विचार करना चाहिए॥५॥ मातुलान्तकशङ्कानां शत्रूंश्चैव व्रणादिकान्। सपत्नीमातरञ्चापि शत्रुस्थानान्निरीक्षयेत्॥६॥ छठे भाव से मामा के मरण की शंका का, शत्रु और व्रण का तथा सौतेली माँ का विचार करना चाहिए॥६॥ जायामध्वप्रयाणं च व्यापारं हतवीक्षणम्। मरणं च स्वदेहस्य जायाभावान्निरीक्षयेत्॥७॥ सप्तम भाव से स्त्री, मार्ग, यात्रा, व्यापार, नष्ट वस्तु और मृत्यु का विचार करना चाहिए॥७॥ ऋणदानग्रहणयोर्गुदे चैवाङ्कुरादयः। गत्यनूकादिकं सर्वं पश्येद्रन्ध्राद्विचक्षणः॥८॥ आठवें भाव से ऋण देना-लेना, गुदा की बीमारी, पूर्वजन्म और इस जन्म का विवरण— ये सब विचार करना चाहिए॥८॥ भाग्यं धर्मं च श्यालं च भ्रातृपत्न्यादिकांस्तथा। तीर्थयात्रादिकं सर्वं धर्मस्थानान्निरीक्षयेत्॥९॥ नवम भाव से भाग्य, साला, भाई की स्त्री, तीर्थयात्रा आदि का विचार करना चाहिए॥९॥
१५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् राज्यं चाकाशवृत्तिं च मानं चैव पितुस्तथा। प्रवासस्य ऋणस्यापि व्योमस्थानान्निरीक्षयेत् ।।१०।। दशम स्थान से राज्य, आकाशवृत्ति, प्रतिष्ठा, पिता, परदेश आदि का विचार करना चाहिए।।१०।। नानावस्तुभवस्यापि पुत्रजायादिकस्य च। लाभवृद्धिपशूनां च भवस्थानाद्विचारयेत् ।।११।। एकादश भाव से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति, पुत्र, स्त्री, पशुओं की वृद्धि तथा लाभ आदि का विचार करना चाहिए।।११।। व्ययं च वैरिवृत्तान्तं फलमन्त्यादिकं तथा। व्ययभावाच्च तत्सर्वं ज्ञातव्यं हि विपश्चिता ।।१२।। बारहवें भाव से व्यय, शत्रु का वृत्तांत आदि का विचार करना चाहिए।।१२।। यो यो भावपतिर्नष्टस्त्रिकेशाद्यैश्च संयुतः ।।१३।। भावं न वीक्षते सम्यग्ग्रहो वापि मृतो यदा। स्थविरो वा भवेत्खेटः सुप्तो वापि प्रपीडितः। तदा तद्भावजं सौख्यं नष्टं ब्रूयाद्विशङ्कितः ।।१४।। जिन-जिन भावों के स्वामी अस्त हों, त्रिकेश (६।८।१२ के स्वामी) से युत हों, भाव को न देखते हों, मृत अवस्था में हों, वृद्ध अथवा सुप्त हों वा पीडित हों तो उन भावों के फल नष्ट हो जाते हैं।।१३-१४।। यदा सौम्यग्रहैर्दृष्टो भावो भावेशसौम्ययुक्। युवा प्रबुद्धराजस्थः कुमारो वापि तद् भवेत् ।।१५।। जो भाव शुभग्रह से दृष्ट हों, भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो, भावेश युवा, प्रबुद्ध, राजकुमार अवस्था में हो।।१५।। ईशेक्षणवशात्तत्र भावसौख्यं वदेद्बुधः। एवं हि सर्वभावेषु ज्ञेयो साधारणो नयः ।।१६।। भाव को भावेश देखता हो तो उस भाव के सुख की वृद्धि होती है। यह नियम सभी भावों में साधारणतः समझना चाहिए।।१६।।
द्वादशभावविचाराध्यायः १५१ शुक्रः शुक्रश्च नेत्रं च चन्द्रमा मनसस्तथा। आत्मा वै दिनकृत्तत्र जीवो जीवितसौख्यदः॥१७॥ शुक्र धातु का स्वामी, नेत्र और मन का चन्द्रमा, आत्मा का सूर्य, गुरु सुख का॥१७॥ क्रोधः पराक्रमो भौमो बुधो बालत्वधीमतः। शनिर्दुःखप्रदो ज्ञेयो राहुरैश्वर्यदायकः॥१८॥ क्रोध, पराक्रम का भौम, बुध बुद्धि का, शनि दुःख का और राहु ऐश्वर्य का स्वामी होता है॥१८॥ शिरोनेत्रे तथा कर्णे नासा चापि कपोलकौ। हनूमुखं तथा वाच्यं लग्नादाद्यदृकाणके॥१९॥ एक लग्न में तीन द्रेष्काण होते हैं। यदि जन्म समय लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न को मुख, २, १२ भाव को नेत्रं, ३, ११ भाव को कान, ४, १२ को नाक, ५, ९ भाव को कपोल, ६, ८ भाव को दाढ़ी, ७ भाव को मुख कल्पना करना चाहिए॥१९॥ लग्नान्मध्यदृकाणे च कण्ठांशौ बाहुकौ तथा। पार्श्वे च हृदयक्रोडे नाभिं चैव यथाक्रमम्॥२०॥ दूसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को कण्ठ, २, १२ भाव को कंधा, ३,११ भाव को बाहु, ४,१० भाव को पार्श्व, ५,९ भाव को हृदय, ६, ८ भाव को पेट, ७ भाव को नाभि कल्पना करना चाहिए॥२०॥ वस्तिर्लिङ्गगुदे वृषणावूरू जानुजङ्घके। पदेति चैवमुदितैर्वाममङ्गं तृतीयके॥१२१॥ तीसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को वस्ति (नाभि-लिंग के मध्य का स्थान), २।१२ भाव को लिंग और गुदा, ३।१० भाव को जंघा, ५।९ भाव को घुटना, ६।८ भाव को ठेहुने के नीचे, ७ भाव को पैर समझना चाहिए। सप्तम से १२ भाव तक वामभाग और लग्न से छठे भाव तक दाहिने भाग की कल्पना करना चाहिए।२१। यस्मिन्नङ्गे स्थितः क्रूरस्तत्र चिह्नं समादिशेत्। ससौम्यैर्नियतं विप्र सौम्यैर्लक्ष्म समादिशेत्॥२२॥
१५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अंग के जिस भाग में पापग्रह हों वहाँ चिह्न कहना चाहिए। यदि बुध के साथ पापग्रह हो तो निश्चय ही चिह्न होता है और शुभग्रह हो तो उस अंग में लक्षण होता है।।२२।। अथ तनुभावफलम्- देहाधिपः पापयुतोऽष्टमस्थो व्यारिगोवाडङ्गसुखं निहन्ति । सर्वत्र भावेषु च योजनीयमेवं बुधैर्भाववशात्फलं हि ।।२३।। लग्नेश पापग्रह से युत होकर आठवें, बारहवें, छठे हो तो शरीर-सुख नहीं होता है। यही नियम सभी भावों का है, यानि जिस भाव का स्वामी पापग्रह से युत होकर ६, ८, १२ वें भाव के फल का अभाव होता है।।२३।। पापो विलग्नाधिपतिर्विलग्ने चन्द्रेण युक्तो यदि बालकः स्यात्। तदातिरोगं स हि केन्द्रसंस्थस्त्रिकोणलाभेषु गदं निहन्ति ।।२४।। यदि लग्नेश पापग्रह चन्द्रमा से युक्त होकर लग्न में हो तो बालक अत्यंत रोगी होता है। यदि वह केन्द्र-त्रिकोण और लाभभाव में हो तो रोग का नाश करता है।।२४।। लग्नाधिपोऽथ जीवो वा शुक्लो वा यदि केन्द्रगः। स जातो धनवांल्लोके दीर्घायू राजवल्लभः ।।२५।। लग्नेश वा गुरु या शुक्र केन्द्र में हो तो जातक धनी, दीर्घायु और राजप्रिय होता है।।२५।। केन्द्रत्रिकोणेषु न यस्य पापा लग्नाधिपःसुरगुरुश्च चतुष्टयस्थौ। भुक्त्वा सुखानि विविधानि च पुण्यकर्मा जीवेत्तु वर्षशतमेव विमुक्तरोगः ।।२६।। जिसके जन्मांग में केन्द्र-त्रिकोण भाव में पापग्रह न हों और लग्नेश तथा गुरु केन्द्र में हों तो वह बालक पुण्यकर्त्ता, अनेक प्रकार के सुखों को भोगने वाला एवं दीर्घायु होता है।।२६।। लग्नेशे चरराशिस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते । कीर्त्तिः श्रीमान्महाभोगी देहपुष्टिसमन्वितः ।।२७।। लग्नेश चरराशि में हो तथा शुभग्रह से देखा जाता हो तो बालक यशस्वी, धनी, भोगों को भोगने वाला औरें बलवान् होता है।।२७।।
द्वादशभावविचाराध्यायः १५३ शुक्रो बुधोऽथवा जीवो लग्ने चन्द्रसमन्वितः । लग्नात्केन्द्रगतो वापि राजलक्षणसंयुतः ।।२८।। यदि शुक्र, बुध वा गुरु चन्द्रमा से युत होकर लग्न से केन्द्र में गये हों तो बालक राजलक्षण से युक्त होता है।।२८।। रविचन्द्रौ च ह्येकस्थावेकांशकसमन्वितौ। त्रिमात्रं च त्रिभिर्मासैर्भ्रात्रा पित्रा च जीवति ।।२९।। रवि-चन्द्रमा एक स्थान में एक ही अंश में हों तो बालक को तीन मास के अन्दर तीन माताएँ होती हैं और भाई पिता से जीवित रहता है।।२९।। लग्ने राहुसमायुक्ते तथा सोमनिरीक्षिते । लग्नांशे मन्दसूरी चेज्जातश्च यमलो भवेत् ।।३०।। लग्न में राहु हो, उसे चन्द्रमा देखता हो तथा लग्न के नवमांश में शनि- गुरु हों तो यमल बालक होते हैं।।३०।। अथ धनभावफलम्- शुक्रेण युक्तो यदि नेत्रनाथः शुक्रस्य स्वोच्चांशगृहे गतो वा । सम्बन्धवान्स्याद्यदि देहपेन नेत्रं विधत्ते विपरीतभावम् ।।३१।। यदि धन भाव का स्वामी शुक्र से युक्त हो और शुक्र के उच्च, नवांश, गृह में हो और लग्नेश से संबंध करता हो तो टेढ़े नेत्र होते हैं।।३१।। तत्र स्थितौ चन्द्ररवी निशान्धं जात्यन्धतां नेत्रपदेहपार्काः। पैत्रर्क्षनाथेन युतास्तदान्ध्यं कुर्वन्ति मात्रादिफलं तथेद्दक् ।।३२।। यदि चन्द्र-सूर्य धनेश-लग्नेश से युक्त होकर दुःस्थ हों तो जन्मांध होता है। पिता आदि के स्वामी युत हों तो उन्हें भी अंधा समझना चाहिए।।३२।। दोषकृन्न च सर्वत्र स्वोच्चस्वर्क्षगतो ग्रहः। षडादित्रयसंस्थश्चेत्तदा दोषकृच्छुभः।।३३।। यदि दोषकर्ता ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो दोष नहीं करता। यदि छठे, आठवें एवं बारहवें में हो तो दोष करता है।।३३।। वागीशवाग्गृहाधीशौ षडादित्रयसंस्थितौ। मूकतां कुरुतेऽप्येवं पितृमातृगृहाधिपाः।।३४।।
१५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु और द्वितीयेश छठे, आठवें, बारहवें भाव में हों तो मूक (गूंगा) होता है। इसी प्रकार पिता, माता आदि के भावेश हों तो उन्हें भी मूक कहना चाहिए।।३४।। विद्याधिपौ जीवबुधावविद्यामरिद्ग्यस्थौ कुरुतोऽथ तौ चेत्। केन्द्रत्रिकोणस्थगृहोच्चसंस्थौ प्रयच्छतां द्रागनवद्यविद्याम्।। गुरु, बुध और द्वितीयेश छठे, आठवें और बारहवें भाव में हों तो मूर्ख होता है। यदि ये केन्द्र-त्रिकोण अपने गृह उच्च राशि में हों तो शीघ्र ही विद्वान् होता है।।३५।। धनाधिपो गुरुर्यस्य धनराशिस्थितो यदि। भौमेन सहितो वापि धनवान् स नरो भवेत् ।। ३६ ।। धनेश और भौम दूसरे भाव में हो तो पुरुष धनी होता है।।३६।। धनेशे लाभराशिस्थे लाभेशे वा धनङ्गते। तावुभौ केन्द्रराशिस्थौ धनवान्स नरो भवेत् ।। ३७ ।। धनेश ११वें भाव में हो और लाभेश दूसरे भाव में हो अथवा दोनों केन्द्र में हों तो धनी होता है।।३७।। धनेशे केन्द्रराशिस्थे लाभेशे तत्रिकोणगे। गुरुशुक्रयुते दृष्टे धनलाभमुदीरयेत् ।।३८।। धनेश केन्द्र में हो और लाभेश उससे त्रिकोण में हो तथा गुरु-शुक्र से युत-दृष्ट हो तो धन का लाभ होता है।।३८।। वित्तेशो रिपुभावस्थो लाभेशो तद्गतो यदि। वित्तलाभौ पापयुक्तौ दृष्टौ निर्धन एव सः।।३९।। धनेश, लाभेश छठे में हों अथवा धन-लाभ पापयुत और पापदृष्ट हों तो निर्धन होता है।।३९।। वित्तलाभाधिपौ दुःस्थौ पापखेचरसंयुतौ। जन्मप्रभृतिदारिद्र्यं भिक्षात्रं लभते नरः।।४०।। धनेश, लाभेश पापग्रह से युत होकर छठे, आठवें, बारहवें भाव में हों तो जन्म से ही दरिद्र होता है और भिक्षा माँगकर खाने वाला होता है।।४०।। षष्ठाष्टमव्ययस्थौ चेद्धनलाभाधिपौ यदि। लाभे कुजे धने राहौ राजदण्डाद्धनक्षयः।।४१।।
द्वादशभावविचाराध्यायः १५५ यदि धनेश एवं लाभेश छठें, आठवें, बारहवें भाव में हो और ११वें भाव में भौम, धन भाव में राहु हो तो राजदंड से धन का नाश होता है।।४१।। लाभे जीवे धने शुक्रे तदीशे शुभसंयुते । व्यये शुभग्रहयुते धर्ममूलाद्धनव्ययः ।।४२।। ११वें भाव में गुरु, दूसरे भाव में शुक्र हो और धनेश शुभग्रह से युत हो और बारहवें भाव में शुभग्रह हो तो धर्म के कारण द्रव्य का व्यय होता है।।४२।। कुटुम्बराशेरधिपः ससौम्ये केन्द्रत्रिकोणे च सुहद्गृही वा। सौम्यर्क्षयुक्तो यदि जातपुण्यः कुटुम्बसंरक्षणवाग्विभूतः ।। द्वितीय भाव का स्वामी शुभग्रह से युक्त होकर केन्द्र-त्रिकोण में मित्र क्षेत्र में वा अपनी राशि में वा शुभग्रह की राशि में हो तो पुण्यवान् कुटुम्ब की रक्षा करने वाला होता है।।४३।। कुटुम्बनाथे परमोच्चयुक्ते देवेन्द्रपूज्ये च समीक्षिते वा । तथाविधे तद्भवनेऽभिजातः सहस्ररक्षो भुवनप्रतापी ।।४४।। धनेश अपने उच्च में हो और गुरु से देखा जाता हो तो सहस्र द्रव्य कों रखने वाला होता है।।४४।। तन्नाथे भृगुणा बुधेन सहिते पारावतांशे तथा स्वोच्चेनाथ सुहद्गृहे धनपतौ स्वस्थानकोलाहलः ।।४५।। धनेश शुक्र-बुध से युक्त हो, पारावतांश में हो, अपने उच्च मित्र के गृह में हो तो प्रसिद्ध धनी होता है।।४५।। कुटुम्बराशिस्थपतौ यदि स्याद्भृगौ बुधे तादृशभावनाथे । स्वोच्चे सुहत्क्षेत्रगतेऽथवा स्यात्परोपकारी जनरक्षकः स्यात् ।। धनेश शुक्र वा बुध अपने उच्च मित्र के गृह में हो तो परोपकारी जनरक्षक होता है।।४६।। नेत्रेशे बलसंयुक्ते शोभनाक्षो भवेन्नरः । षष्ठाष्टमव्यये युक्ते नेत्रे वैकल्यमादिशेत् ।।४७।। धनेश बलवान् हो तो सुंदर नेत्रों वाला होता है। यदि छठे, आठवें, बारहवें भाव में हो तो नेत्र में विकारवाला होता है।।४७।।
१५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनेशे पापसंयुक्ते धने पापसमन्विते। असत्यवादी पिशुनः पवनव्याधिसंयुतः॥४८॥ धनेश पापग्रह से युत हो और धनभाव में पापग्रह हो तो झूठ बोलने वाला, कृपण और वातव्याधि से युक्त होता है॥४८॥ अथ सहजभावफलम्— सभौमो भ्रातृभावेशो त्रिकभिन्नं च चेत् स्थितः। भ्रातृक्षेत्रगतो वापि भ्रातृभावं विनिर्दिशेत्॥४९॥ मंगल के साथ तीसरे भाव के स्वामी त्रिक (६।८।१२) से भिन्न स्थान में वा तीसरे भाव में हो तो भाइयों का सुख होता है॥४९॥ तौ पापयोगतः पापक्षेत्रयोगेन वा पुनः। उत्पाट्य सहजान्सद्यो निहन्ता शास्त्रनिश्चयात्॥५०॥ वे ही दोनों पापग्रह से युत हों और त्रिक में हों तो भाइयों का जन्म होता है, किन्तु बचते नहीं हैं॥५०॥ स्त्रीग्रहो भ्रातृभावेशः स्त्रीग्रहो भ्रातृगोऽपि वा। भगिनी स्यात्तदा भ्राता पुंगृहे पुंग्रहो यदि॥५१॥ यदि भ्रातृभाव का स्वामी स्त्रीग्रह हो और तीसरे भाव में भी स्त्रीग्रह हो तो बहिनें होती हैं। पुरुष ग्रह हो तो भाई होते हैं॥५१॥ भ्रातृभे कारके वापि शुभयुक्तनिरीक्षिते। भावे वा बलसम्पूर्णे भ्रातॄणां वर्धनं भवेत्॥५२॥ भ्रातृभाव वा भ्रातृकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हो और भ्रातृभाव पूर्ण बलवान् हो तो भाइयों की वृद्धि होती है॥५२॥ केन्द्रत्रिकोणगे वापि स्वोच्चमित्रस्ववर्गगे। नाथे वा कारके वापि भ्रातृलाभं वदेद्बुधः॥५३॥ यदि भ्रातृभावेश वा भ्रातृकारक केन्द्र-त्रिकोण में अपने उच्चमित्र आदि स्ववर्ग में हो तो भाइयों का लाभ होता है॥५३॥ भ्रातृभे बुधसंयुक्ते तदीशे चन्द्रसंयुते। कारके मन्दसंयुक्ते भगिन्येकाग्रतो भवेत्॥५४॥ भ्रातृभावेश चन्द्रमा से युक्त हो और भ्रातृभाव में बुध हो और भ्रातृकारक शनि से युत हो तो उसके पहले एक बहन होती है॥५४॥