भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

१५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् राज्यं चाकाशवृत्तिं च मानं चैव पितुस्तथा। प्रवासस्य ऋणस्यापि व्योमस्थानान्निरीक्षयेत् ।।१०।। दशम स्थान से राज्य, आकाशवृत्ति, प्रतिष्ठा, पिता, परदेश आदि का विचार करना चाहिए।।१०।। नानावस्तुभवस्यापि पुत्रजायादिकस्य च। लाभवृद्धिपशूनां च भवस्थानाद्विचारयेत् ।।११।। एकादश भाव से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति, पुत्र, स्त्री, पशुओं की वृद्धि तथा लाभ आदि का विचार करना चाहिए।।११।। व्ययं च वैरिवृत्तान्तं फलमन्त्यादिकं तथा। व्ययभावाच्च तत्सर्वं ज्ञातव्यं हि विपश्चिता ।।१२।। बारहवें भाव से व्यय, शत्रु का वृत्तांत आदि का विचार करना चाहिए।।१२।। यो यो भावपतिर्नष्टस्त्रिकेशाद्यैश्च संयुतः ।।१३।। भावं न वीक्षते सम्यग्ग्रहो वापि मृतो यदा। स्थविरो वा भवेत्खेटः सुप्तो वापि प्रपीडितः। तदा तद्भावजं सौख्यं नष्टं ब्रूयाद्विशङ्कितः ।।१४।। जिन-जिन भावों के स्वामी अस्त हों, त्रिकेश (६।८।१२ के स्वामी) से युत हों, भाव को न देखते हों, मृत अवस्था में हों, वृद्ध अथवा सुप्त हों वा पीडित हों तो उन भावों के फल नष्ट हो जाते हैं।।१३-१४।। यदा सौम्यग्रहैर्दृष्टो भावो भावेशसौम्ययुक्। युवा प्रबुद्धराजस्थः कुमारो वापि तद् भवेत् ।।१५।। जो भाव शुभग्रह से दृष्ट हों, भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो, भावेश युवा, प्रबुद्ध, राजकुमार अवस्था में हो।।१५।। ईशेक्षणवशात्तत्र भावसौख्यं वदेद्बुधः। एवं हि सर्वभावेषु ज्ञेयो साधारणो नयः ।।१६।। भाव को भावेश देखता हो तो उस भाव के सुख की वृद्धि होती है। यह नियम सभी भावों में साधारणतः समझना चाहिए।।१६।।