बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
४. अष्टकवर्ग, सुदर्शन चक्र, शान्ति-विधान, ग्रह-जाप एवं होरा शास्त्र उपसंहार
अष्टकवर्गाध्यायः । ६०९ भृगुभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे. सं. ५२ भृगोरष्टकवर्गः
| शु. | शं. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |
अथ शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- शनेः रवितनू सूर्यो लग्नेन्दुकुजसूर्यजाः । लग्नाकौ जीवमन्दाराः सर्वे सूर्य बिना क्षते ॥६६॥ शनि से १ भाव में सूर्य, लग्न ये दोनों रेखाप्रद हैं। २ भाव में सूर्य। ३ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि रेखाप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, सूर्य रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शनि, भौम रेखाप्रद हैं। ६ भाव में चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं।।६६।। अंर्कोऽर्कजौ बुधोऽर्कारितनुज्ञाः सकलाश्चताः । कुजज्ञगुरुशुक्राश्च क्रमात्स्थानमिदं विदुः ॥६७॥ ७ भाव में सूर्य। ८ भाव में सूर्य, बुध रेखाप्रद हैं। ९ भाव में बुध। १० भाव में सूर्य, भौम, लग्न, बुध रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये रेखाप्रद है। १२ भाव में भौम, बुध, गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं।।६७।। शनेः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह रे सं. ३९ शनेरष्टकवर्गः
| श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | ३ | ३ | ६ | ५ | ६ | १ |
| ५ | २ | ६ | ५ | ८ | ६ | ११ | ३ |
| ६ | ४ | ११ | ६ | ९ | ११ | १२ | ४ |
| ११ | ७ | १० | १० | १२ | ६ | ||
| ८ | ११ | ११ | १० | ||||
| १० | १२ | १२ | ११ | ||||
| ११ |
६१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ लग्नस्य भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह- अथ स्थानं प्रवक्ष्यामि लग्नस्य द्विजपुंगव ॥६८॥ हे मैत्रेय! रेखा को ही स्थान कहते हैं। लग्न के रेखाप्रद ग्रहों को कह रहा हूँ॥६८॥ आर्किज्ञशुक्रगुर्वाराः सौम्य देवेज्यभार्गवाः । हित्वा सौम्यगुरु शेषाः सूज्ञेज्यभृगुसूर्यजाः ॥६९॥ लग्न भाव में शनि, बुध, शुक्र, गुरु, भौम ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। २ भाव में बुध, गुरु, शुक्र ये रेखाप्रद हैं॥६९॥ तथा जीवभृगुवुधौ सर्वे शुक्रं बिना क्षते । जीव एकस्तथा द्यूने मृतौ सौम्यभृगू तथा ॥७०॥ ३ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, शुक्र, शनि, लग्न रेखाप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र, शनि रेखाप्रद हैं। ५ भाव में गुरु, शुक्र रेखाप्रद हैं। ६ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शनि लग्न रेखाप्रद हैं।
अष्टकवर्गाध्यायः । ६११ करणं विन्दुवत्प्रोक्तं स्थानं रेखा तथोच्यते । मुनिदिग्वसुवेदादिगिष्वद्र्यष्टनवेषवः ॥७२॥ रूद्रार्का वर्गाणामेषाद्द्विविषयेऽष्टवायवः । पंक्तिस्वरेषवः सूर्याद्गिर्गुणा प्रोच्यते बुधैः ॥७३॥ करण का स्वरूप विन्दु (शून्य) का है और स्थान का स्वरूप रेखा के (।) सदृश है। मेषादि राशियों का क्रम से ७।१०।८।४।१०।५।७।८।९।५।११।१२ ये गुणक हैं। और सूर्यादि ग्रहों को ५।५।८।५।१०।७।५ ये गुणक हैं॥७२- ७३॥ राशिगुणकबोधकचक्रम्।
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | राशयः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ७ | १० | ८ | ४ | १० | ५ | ७ | ८ | ९ | ५ | ११ | १२ | गुणकः |
| ग्रहगुणकबोधकचक्रम्। | ||||||||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ग्रहाः | |||||
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | |||||
| ५ | ५ | ८ | ५ | १० | .५ | गुणकः | ||||||
| करणस्थान लेखनविधिः- | ||||||||||||
| नव रेखालिखेदूर्ध्वास्तिर्यग्रेखास्त्रयोदश । | ||||||||||||
| तदा तु षण्णवतिः स्युः ग्रहयोगे पदानि च ॥७४॥ | ||||||||||||
| नव रेखा ऊर्ध्वाधर (खड़ी) और तेरह रेखा आड़ी (तिरछी) लिखने से ९६ | ||||||||||||
| कोष्ठ का चक्र ग्रहों के योग के लिये बन जाते हैं॥७४॥ | ||||||||||||
| तस्याशुभस्य विन्यस्य चाष्टवर्गं ततः क्रमात् । | ||||||||||||
| त्रिकोणेकाधिपत्यस्य कुर्याच्छोधनकं बुधः ॥७५॥ | ||||||||||||
| पूर्वोक्त अशुभ सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम में सम्पर्क रखनेवाले पूर्वोक्त पापग्रहों | ||||||||||||
| का अष्टवर्ग रखकर त्रिकोण और एकाधिपत्य शोधन करें। त्रिकोण स्थान ३ होते | ||||||||||||
| हैं अर्थात् १।५।९ इसी का संशोधन करना॥७५॥ | ||||||||||||
| इति पाराशर होरायामुत्तरभागे प्रथमोध्यायः। |
६१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ द्वितीयोऽध्यायः भावसाधनम् - लग्नं सुखात् सुखं कामात् कामं खात् खं च लग्नतः । त्र्यंशमेकद्विगुणितं युज्याल्लग्नादिषु क्रमात् ॥१॥ लग्न को सुख भाव से घटाना, सुख भाव को सातवें भाव से, सातवें भाव को दशम भाव से और दशम भाव को लग्न से घटाकर शेष का तृतीयांश लेकर क्रम से १ और २ से गुणकर पूर्व के भावों में जोड़ने से आगे के दो भाव हो जाते हैं। अर्थात् लग्न को सुखभाव से घटाकर शेष का तृतीयांश एक से गुणकर लग्न में जोड़ने से द्वितीय भाव और तृतीयांश को २ से गुणकर लग्न में जोड़ने से तृतीय भाव होता है॥१॥ पूर्वापरयुतेरर्ध संधिः स्याद्द्वयोर्द्वयोः । एवं द्वादशभावास्तु भवन्ति च ससंधयः ॥२॥ पूर्वभाव और आगे के भाव का योग कर आधा करने से भाव का संधि होती है। इस प्रकार संधि के सहित १२ भाव होते हैं॥२॥ उदाहरण-जैसे संवत् २०१३ श्रावण कृष्ण १३ शनिवासरे पुनर्वसुभे प्रथमचरणे इष्टम ३२।२८।३० जन्मलग्नम् ९।१७।५०।१४। स्पष्टग्रह । जन्माङ्कम् । | सू. | चं | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | | ३ | २ | १० | ४ | ४ | २ | ७ | | १८ | २२ | १२ | ५ | १२ | २ | ३ | | २६ | ३० | ३२ | २२ | ५ | ३ | ४० | | ३४ | ४७ | ८ | ५९ | ५० | ५ | ५२ | [जन्माङ्क चक्र (कुण्डली): प्रथम भाव (लग्न): १०; द्वितीय भाव: ११ मं; तृतीय भाव: १२; चतुर्थ भाव: १; पञ्चम भाव: के २; षष्ठ भाव: शु ३ चं; सप्तम भाव: सू. ४; अष्टम भाव: बु ५ बृ; नवम भाव: ६; दशम भाव: ७; एकादश भाव: रा ८ श; द्वादश भाव: ९] भावस्पष्ट का उदाहरण- सुख भाव राश्यादि १।१।२९।४ इसमें लग्न राश्यादि ९।१७।५०।१४ को घटाया तो शेष ३।१३।३८।५० शेष रहा इसमें तीन से भाग देने से लब्धि राश्यादि १।४।३२।५६ हुई इसे लग्न में जोड़ने से राश्यादि १०।२२।२३।१० धनभाव हुआ। पुनः लब्धि को २ से गुणा देने से राश्यादि २।९।५।५३।२० हुआ इसे लग्न में जोड़ने से राश्यादि ११।२६।५६।७ यह सहजभाव हुआ। लग्न और धनभाव को जोड़कर आधा करने से ४।५।६।४२ यह दोनों भावों के बीच की संधि हुई। इसी प्रकार अन्य भावों का भी साधन करना चाहिये। लग्न से ६ भावों में ६ राशि जोड़ने से शेष ६ भाव और उनकी संधियां हो जाती हैं शेष चक्र में स्पष्ट है।
.
* बु.:
सू.
चं.
बृ.
शु.
श.
* बृ.:
सू.
चं.
बु.
शु.
श.
* शु.:
सू.
चं.
बु.
बृ.
* श.:
मं.
बु.
बृ.
* Row: शत्रवः (labeled vertically at right: शत्रवः)
* सू.:
मं.
श.
* चं.:
मं.
शु.
* मं.:
सू.
चं.
बु.
बृ.
शु.
* बु.:
मं.
(Wait! What is below मं.? Is there a बु.? Wait! Look at that cell: under मं. there is बु.?
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Sun is in 10s (Kumb
६१४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ दृष्टिवलसाधनम् – दृश्याद्विशोध्य द्रष्टारं षड्राशिभ्योऽधिकंभवेत् । दिग्भ्यो विशोध्य द्वाभ्यां तु भागीकृत्य चदृष्टयः ॥३।। जो ग्रह जिस ग्रह को देखता हैं उसे द्रष्टा कहते हैं; जिसे देखता हैं उसे दृश्य कहते हैं। दृश्य ग्रह में द्रष्टाग्रह को घटा देना शेष राशि स्थान में ६ से अधिक बचे तो उसे १० में घटाकर शेष में दो से भाग देने से दृष्टि होती है।।३।। द्रष्टाग्रह।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४५<br>४५ |
| चं. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>२०<br>२ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>३५<br>६ |
| मं. | ०<br>४७<br>५८ | ०<br>५०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>५६<br>२६ | ०<br>५९<br>२२ | ०<br>२४<br>४६ | ०<br>५६<br>५ |
| बु. | ०<br>०<br>० | ०<br>६<br>२६ | ०<br>४५<br>४१ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>१८<br>५९ | ०<br>५४<br>३६ |
| बृ. | ०<br>०<br>० | ०<br>१०<br>१० | १<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>२५<br>४७ | ०<br>३९<br>४० |
| शु. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४०<br>२९ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४५<br>१८ |
| श. | ०<br>३७<br>५२ | ०<br>०<br>० | ०<br>१९<br>५६ | ०<br>४२<br>१७ | ०<br>११<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० |
| शुभ-<br>योग | ०<br>०<br>० | ०<br>१६<br>३६ | २<br>४६<br>१२ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>५०<br>६ | २<br>३४<br>४१ |
| पाप-<br>योग | १<br>२५<br>५० | ०<br>५०<br>० | ०<br>१९<br>५६ | १<br>३८<br>४३ | १<br>१०<br>२२ | ०<br>३४<br>४६ | १<br>४१<br>५० |
अथ द्वितीयोऽध्यायः। ६१५ दृग्बलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ° | ° | ° | ° | ° | ° | ° | अंश |
| २१ | ८ | ३३ | ९ | १७ | ६ | १८ | क. |
| २७ | २१ | ४८ | ४१ | ३५ | २० | १३ | विक |
| ऋ. | ऋ. | ध. | ऋ. | ऋ. | ध. | ध. | सं. |
| शराधिके विनाराशिं भागाद्विघ्नाश्च दृष्टयः । | |||||||
| वेदाधिके त्यजेद्भूताद्भागाद्दृष्टिस्त्रिभाधिके ॥४॥ | |||||||
| यदि शेष ५ से अधिक बचे तो राशि को छोड़कर शेष अंशादि को दूना करने | |||||||
| से दृष्टि होती है। चार से अधिक शेष बचे तो ५ में घटा दे शेष राशि को छोड़कर | |||||||
| अंशादि दृष्टि होती है॥४॥ | |||||||
| विशोध्यार्णवतो द्वाभ्यां लब्धस्त्रिंशद्युतं भवेत् । | |||||||
| कराधिके विनाराशिं भागास्तिथियुतं भवेत् ॥५॥ | |||||||
| यदि शेष तीन से अधिक बचे तो उसे चार राशि में घटाकर दो से भाग देकर | |||||||
| लब्ध में ३० जोड़ देने से दृष्टि होती है। शेष दो से अधिक हो तो राशि को छोड़कर | |||||||
| अंश में १५ जोड़ देने से दृष्टि होती है॥५॥ | |||||||
| रूपाधिके बिना राशिं भागा द्वाभ्यांविभाजिताः । | |||||||
| त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे क्रमादथ ॥६॥ | |||||||
| शरवेदा खरामाश्च तिथयो योजिताः क्रमात् । | |||||||
| शनिदेवेज्य भौमानामादौ दृष्टिः स्फुटा भवेत् ॥७॥ | |||||||
| यदि द्रष्टा दृश्य का अन्तर एक से अधिक हो तो राशि को छोड़कर अंशादि | |||||||
| को २ से भाग देने से लब्धि तुल्य दृष्टि होती है। शनि की तृतीय दशम दृष्टि हो | |||||||
| तो ४५, गुरु के त्रिकोण दृष्टि में ३० और मंगल के चतुरस्र (४।८) दृष्टि में दृष्टि | |||||||
| फल में १५ और जोड़ देने से स्पष्ट दृष्टि होती है॥६-७॥ | |||||||
| उदाहरण- जैसे द्रष्टा सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ दृश्य भौम राश्यादि | |||||||
| १०।१२।३२।८ दृश्य में द्रष्टा को घटाने से शेष राश्यादि ६।२४।५।३४ हुआ | |||||||
| यह ६ से अधिक है अतः इसे १० में घटाने से शेष राश्यादि ३।५।५४।२६ | |||||||
| हुआ राशि का अंश बनाकर अंश जोड़कर २ से भाग देने लब्धि ०।४७।५८ यह | |||||||
| भौम पर सूर्य की दृष्टि हुई इसी प्रकार अन्य ग्रहों का दृष्टि साधन करना शेष चक्र | |||||||
| से स्पष्ट है। | |||||||
| उच्चबल साधन। | |||||||
| नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् । | |||||||
| भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं फलमुच्चबलं भवेत् ॥८॥ |
६१६ • वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ग्रह में उसके नीच राश्यादि को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक हो तो १२ राशि में घटाकर शेष का अंश बनाकर उसमें तीन का भाग देने से फल उच्चबल होता है॥८॥ उदाहरण- जैसे सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ इसका नीच राश्यादि ६।१० है इसको सूर्य में घटाने से शेष राश्यादि ९।८।२६।३४ बचा यह ६ राशि से अधिक इसलिये इसे १२ राशि में घटाने से शेष २।२१।३३।२६ बचा इसमें राशि का अंश बनाकर ३ से भाग देने से २७।११।८ यह सूर्य का उच्चबल हुआ शेषचक्र में स्पष्ट हैं। उच्चबलचक्र।
| सू. | चं. | म. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ° | ° | ° | ° | ° | ° | ° | अंश |
| २७ | ४३ | ५५ | ४६ | ४९ | ३८ | ५५ | कला |
| २१ | ३० | ८ | ४७ | ५२ | १९ | ४६ | विक |
| सप्तवर्गज बल साधन | |||||||
| मूलत्रिकोणस्वर्क्षाधिमित्रमित्रसमारिषु । | |||||||
| अधिशत्रुगृहे चापि स्थितानां क्रमशोबलम् ॥९॥ | |||||||
| भूताब्धयः खरामाश्च नखास्तिथिर्दिशो युगाः । | |||||||
| ग्रह अपने मूलत्रिकोण राशि में हो तो ४५, अपने राशि में हो तो ३०, अपने | |||||||
| अधिमित्र की राशि में हो तो २०, अपने मित्र की राशि में हो तो १५, सम की | |||||||
| राशि में हो १०, शत्रु की राशि में हो तो ४ और अधिशत्रु की राशि में हो तो | |||||||
| २ बल प्राप्त करता है॥९॥ स्पष्टार्थ चक्र को देखिये। | |||||||
| सप्तवर्गजबलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रहाः |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| १५<br>० | १०<br>० | १०<br>० | २०<br>० | २०<br>० | १०<br>० | १०<br>० | ग्रहबल |
| २०<br>० | ३०<br>० | १०<br>० | २०<br>० | २०<br>० | १०<br>० | २<br>० | होराबल |
| १०<br>० | २<br>० | २<br>० | २९<br>० | ३०<br>० | २०<br>० | १०<br>० | द्रेष्काबल |
| १०<br>० | ४<br>० | ३०<br>० | ३०<br>० | १०<br>० | २०<br>० | १०<br>० | सप्तमांबल |
| २०<br>० | ४<br>० | १०<br>० | २०<br>० | २०<br>० | ३०<br>० | २<br>० | नवमांबल |
| २<br>० | १५<br>० | १०<br>० | २०<br>० | १५<br>० | २०<br>० | १५<br>० | द्वादशांबल |
| १५<br>० | २०<br>० | १०<br>० | १५<br>० | ३०<br>० | १५<br>० | १०<br>० | त्रिंशांशबल |
| ४३<br>० | ९५<br>० | ८२<br>० | १४५<br>० | १४५<br>० | १३५<br>० | ५९<br>० | वलैक्यबल. |
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१७
गेहाङ्गम्।
- लग्नम् (१०)
- द्वितीयम् (११) : मं.
- तृतीयम् (१२)
- चतुर्थम् (१)
- पञ्चमम् (२)
- षष्ठम् (३) : चं., शु.
- सप्तमम् (४) : सू.
- अष्टमम् (५) : बु., वृ.
- नवमम् (६)
- दशमम् (७)
- एकादशम् (८) : श.
- द्वादशम् (९)
होराङ्गम्।
- लग्नम् (५) : बु., मं., शु., वृ.
- द्वितीयम् (६)
- तृतीयम् (७)
- चतुर्थम् (८)
- पञ्चमम् (९)
- षष्ठम् (१०)
- सप्तमम् (११)
- अष्टमम् (१२)
- नवमम् (१)
- दशमम् (२)
- एकादशम् (३)
- द्वादशम् (४) : सू., चं., श.
द्रेष्काणाङ्गम्।
- लग्नम् (२)
- द्वितीयम् (३) : मं., शु.
- तृतीयम् (४)
- चतुर्थम् (५) : बु.
- पञ्चमम् (६)
- षष्ठम् (७) : सू.
- सप्तमम् (८) : श.
- अष्टमम् (९) : वृ.
- नवमम् (१०)
- दशमम् (११) : चं.
- एकादशम् (१२)
- द्वादशम् (१)
सप्तमांशांगम्।
- लग्नम् (८) : चं.
- द्वितीयम् (९)
- तृतीयम् (१०)
- चतुर्थम् (११)
- पञ्चमम् (१२)
- षष्ठम् (१) : मं.
- सप्तमम् (२) : श.
- अष्टमम् (३) : शु.
- नवमम् (४)
- दशमम् (५)
- एकादशम् (६) : बु.
- द्वादशम् (७) : वृ., सू.
नवमांशांगम्।
- लग्नम् (३)
- द्वितीयम् (४) : श., वृ.
- तृतीयम् (५)
- चतुर्थम् (६)
- पञ्चमम् (७) : शु.
- षष्ठम् (८)
- सप्तमम् (९)
- अष्टमम् (१०) : मं.
- नवमम् (११)
- दशमम् (१२) : सू.
- एकादशम् (१) : चं.
- द्वादशम् (२) : बु.
द्वादशांगम्।
- लग्नम् (६)
- द्वितीयम् (७) : बु.
- तृतीयम् (८)
- चतुर्थम् (९) : श.
- पञ्चमम् (१०) : सू., वृ.
- षष्ठम् (११)
- सप्तमम् (१२) : चं.
- अष्टमम् (१)
- नवमम् (२)
- दशमम् (३) : शु.
- एकादशम् (४) : मं.
- द्वादशम् (५)
त्रिंशांशांगम्।
- लग्नम् (१२)
- द्वितीयम् (१) : शु.
- तृतीयम् (२) : श., चं.
- चतुर्थम् (३) : सू.
- पञ्चमम् (४)
- षष्ठम् (५)
- सप्तमम् (६)
- अष्टमम् (७)
- नवमम् (८)
- दशमम् (९) : मं., वृ.
- एकादशम् (१०)
- द्वादशम् (११) : वृ.
६१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युग्मायुग्मबल- द्वाविन्दुशुक्रौ युग्मांशे तिथिरोजांशगाः परे ।।१०।। चन्द्रमा और शुक्र समराशि या समराशि के नवांश में हों तो १५ बल अर्थात् दोनों में हो तो ३० बल पाते हैं, अन्य ग्रह सूर्य, भौम, बुध, गुरु, शनि ये विषम राशि या विषम राशि के नवांश में हों तो १५ बल पाते हैं।।१०।। युग्मायुग्मबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | अंश |
| १५ | ० | १५ | १५ | १५ | ० | १५ | कला |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | विकला |
केन्द्रादि द्रेष्काणबल- केन्द्रादिषुस्थिता लग्नात्षष्टिस्त्रिंशत्तिथिः क्रमात् । आदिमध्यावसानेषु द्रेष्काणेषु स्थिताः क्रमात् ।।११।। केन्द्रादि अर्थात् केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में ग्रह हो तो क्रम से ६०, ३० १५ बल पाता है।।११।। पुंन्नपुंसकयोषाख्या दद्युस्तिथिबलं ग्रहाः । स्वषड्वर्गगतास्त्रिंशदेवं स्थानबलं विदुः ।।१२।। पुरुष ग्रह (सूर्य, भौम, गुरु) प्रथम द्रेष्काण में, नपुंसक ग्रह (बुध, शनि) दूसरे द्रेष्काण में और स्त्रीग्रह (चंद्र, शुक्र) तीसरे द्रेष्काण में १५ बल पाते हैं। विशेष- यदि ग्रह अपने षड्वर्ग में हों तो द्रेष्काण में ३० बल पाता है। इस प्रकार पूर्व के सभी बलों को मिलाने से ग्रह का स्थान बल होता है।।१२।।
केन्द्रादिबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | १५ | ३० | ३० | ३० | १५ | ३० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
द्रेष्काणबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | १५ | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
उच्चबल + सप्तवर्गजबल + युग्मायुग्मबल + केन्द्रादिबल + द्रेष्काणबल = स्थान बल।
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१९ स्थानबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | २ | २ | ३ | ३ | ३ | २ | अंश |
| २५ | ४८ | ५७ | ५६ | ५९ | ८ | २४ | कला |
| ११ | ३० | ८ | ४७ | ५२ | १९ | ४० | विकला |
| दिग्बल। | |||||||
| अर्कात्कुजात्सुखं जीवाज्ज्ञाच्चास्तं लग्नमार्कतः । | |||||||
| मध्यलग्नं भृगोश्चंद्राद्वित्वा षड्भाधिके सति ।।१३।। | |||||||
| चक्राद्विशोध्य रामाप्तं भागीकृत्य च तद्बलम् । | |||||||
| सूर्य और मंगल से सुखभाव को, गुरु और बुध से सप्तम भाव को, शनि | |||||||
| से लग्न को, शुक्र और चन्द्र से दशम लग्न को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक | |||||||
| हो तो।।१३।। | |||||||
| इसको १२ राशि में घटाकर शेष का अंश कर ३ से भाग देने से दिग्बल | |||||||
| होता है।।१३।। | |||||||
| दिग्बलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| १५ | ४२ | २६ | ५ | ८ | ४९ | २५ | अंश |
| ३९ | ५९ | १८ | ५० | २० | ४८ | ३ | कला |
| १० | २५ | ५८ | ५५ | १४ | ३९ | ७ | विकला |
| कालबल नतोन्नबल। | |||||||
| आमध्याह्नादर्धरात्राद्विवारात्रिरिति क्रमात् ।।१४।। | |||||||
| अर्कभार्गवसूरीणांद्विघ्ना नाड्योर्गता दिवा । | |||||||
| भौमचन्द्रशनीनां तु षष्ठिभ्यो वर्जयेदिमाः ।।१५।। | |||||||
| मध्याह्न से अर्धरात्रि के अन्दर इष्टकाल हो तो नत को दूना करने से सूर्य, | |||||||
| शुक्र और गुरु का नतवल होता हैं और इसे ६० में घटाने से मंगल, चन्द्र, शनि | |||||||
| का दिवावल होता है। अर्धरात्रि से मध्याह्न के अंतर का इष्टकाल हो तो उन्नत घटी | |||||||
| का दूना करने से चन्द्र, मंगल शनि का रात्रिवल होता है और इसे ६० में घटाने | |||||||
| से सूर्य, शुक्र, गुरु का रात्रिवल कलात्मक होता है और बुध का सदैव १ अंशवल | |||||||
| होता है।।१४-१५।। | |||||||
| उदाहरण- नतकाल १३।१३।३० को २ से गुण देने से २६।२७ यह | |||||||
| चन्द्रमा, भौम शनि का बल हुआ और उन्नत घट्यादि १६।४७।३० को दो से | |||||||
| गुण देने से सूर्य, गुरु, शुक्र का बल हुआ शेष चक्र में स्पष्ट है। |
६२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नतोन्नतबल।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | ० | १ | ० | ० | ० | अंश |
| ३३ | २६ | २६ | ० | ३३ | ३३ | २६ | कला |
| ३५ | २७ | २७ | ० | ३५ | ३५ | २७ | विक. |
| पक्षबल- | |||||||
| दिवाबलमिति प्रोक्तं बलं नैशं ततोऽन्यथा । | |||||||
| षष्टिरेव सदाज्ञस्य चन्द्रादर्कं विशोध्य च ।।१६।। | |||||||
| अङ्गाधिके विशोध्यार्काद्भागीकृत्य त्रिभिर्भजेत् । | |||||||
| पक्षकंबलमिन्दुज्ञशुकार्याणां तु षष्ठितः ।।१७।। | |||||||
| चन्द्रमा में सूर्य को घटा दे यदि शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ | |||||||
| में घटाकर शेष का अंश बनाकर ३ से भाग देने से लब्ध चन्द्र, बुध, शुक्र और | |||||||
| गुरु का पक्षबल होता है और इसे ६० में घटा देने से शेष ग्रह-सूर्य, भौम और | |||||||
| शनि का पक्षबल होता है।।१६-१७।। | |||||||
| उदाहरण- १।२२।३०।४७ में सूर्य २।१८।२६।३४ को घटाने से शेष | |||||||
| ११।४।४।१३ यह ६ राशि से अधिक है इसलिये इसे १२ में घटाकर शेष | |||||||
| ०।२५।५५।४७ में ३ का भाव देने से ०।३८।३५ यह चन्द्र, बुध, शुक्र और | |||||||
| गुरु का पक्षबल हुआ। इसे ६० में घटाने से शेष ०।२१।२५ यह सूर्य भौम शनि | |||||||
| का पक्षबल हुआ। पक्षबलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
| :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | अंश |
| २१ | ३८ | २१ | ३८ | ३८ | ३८ | २१ | कला |
| २५ | ३५ | २५ | ३५ | ३५ | ३५ | २५ | विक. |
| दिवारात्रित्रिभागबल- | |||||||
| हित्वामन्येषामहोमानं त्रिभागीकृत्य यत्र तु । | |||||||
| जन्मलग्नतदंशाधिपतेः षष्ठिबलं भवेत् ।।१८।। | |||||||
| आधाने चित्तप्रवेशे तु त्रिंशद्भूतार्णवा वलम् । | |||||||
| ज्ञार्कमन्देन्दुशुक्राराः पतयः सर्वदागुरुः ।।१९।। | |||||||
| अहोरात्र अर्थात् दिन और रात्रि का तीन-तीन भाग करने से ६ भाग होता | |||||||
| है इन ६ भागों के अधिपति क्रम से बुध, सूर्य, शनि, चन्द्र, शुक्र और भौम होते | |||||||
| हैं। अंशाधिपति अर्थात् जिस भाग में जन्मलग्न हो उसके स्वामी का ६० कला बल | |||||||
| होता है। गर्भाधान में ३० और चैतन्य प्रवेश में ४५ बल होता है और गुरु का |
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२१ सर्वदा १ अंश बल होता है, शेष चक्र से स्पष्ट है।।१८-१९।। दिवारात्रित्रिभागबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | १ | ० | ० | १ | ० | ० | अंश |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | कला |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | विक. |
| वर्षमासदिनहोरेशबल- | |||||||
| वर्षमासदिनेशानां तिथि स्त्रिंशच्छरार्णवाः । | |||||||
| कालहोराधिपस्यैवं पूर्णं बलमुदाहृतम् ।।२०।। | |||||||
| वर्ष-मास, दिन के स्वामियों का क्रम से १५, ३०, ४५ बल होता है और | |||||||
| कालहोरेश का पूर्ण १ अंश बल होता है। पूर्व के सभी ४ बलों का योग करने | |||||||
| से कालवल होता है।।२०।। | |||||||
| वर्षेशादि साधन | |||||||
| शके १८७८ श्रावण कृष्ण १३ शनिवार को कलियुगादि अहर्गण साधन। | |||||||
| १८७८ + ३१७९ = ५०५७ गतकलिः | |||||||
| १२× | |||||||
| ६०६८४ —मास | |||||||
| ३ —गतमास | |||||||
| ६०६८७ | |||||||
| ७०)६०६८७(८६६ ६०६८७ ६०६८७ | |||||||
| ५६० ८६६ १८६५ | |||||||
| --- ------- ------ | |||||||
| ४६८ ३३)६१५५३(१८६५ ६२५५२ | |||||||
| ४२० ३३ ३० | |||||||
| --- ---- --------- | |||||||
| ४८७ २८५ १८७६५६० | |||||||
| ४२० २६४ २७ गति | |||||||
| --- ---- --------- | |||||||
| ६७ २१५ १८७६५८७ | |||||||
| १९८ ×११ | |||||||
| ---- --------- | |||||||
| १७३ ७०३)२०६४२४५७(२९३६३ | |||||||
| १६५ १४०६ | |||||||
| --- ----- | |||||||
| ८ ६५८२ | |||||||
| ६३२७ |
२५५४ २१०९
४४५५ ४२१८
२३७७ २१०९
१८७६५८७ २६८ २९३६३
१८४७२२४ १
१८४७२२५ अहर्गणः।
६२२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वर्षेश-मासेश साधन। अहर्गण—३७३ / २५२० = ल + शे शेष / ३६० ल.। शेष / ३० = ल×३+१ / ७ = शेष = वर्षेश ल×२+१ / १२ = शेष = मासेश इसके अनुसार १८४७२२५ ३७३ २५२०) १८४६८५२ (७३२ ३६०) २२१२ (६ ३०) २२१२ (७३० ल. १७६४० २१६० २१० ८२८५ ५२ ११२ ७५६० ९० ७२५२ २२ ५०४० ६×३+१ / ७ = ५ वर्षेश = गुरु २२१२ शेष ७३×२+१ / १२ = ३ मासेश = भौम इस प्रकार से वर्षेश गुरु और मासेश भौम हुये। जिस दिन जन्म होता है वही वारेश होता है। कालहोरेश साधन उक्त दिन बार प्रवृत्ति सूर्योदय के बाद २ घटी १२ पल पर हुई है अतः बार प्रवृत्ति से इष्ट घटी ३०।१६ हुआ। (३०।१६ × २) / ५ = ल. = १२, शे. = ०।३२ (६०।३२ - ०।३२ + १) / ७ = ५७ दिनपति से ५ वाँ भौम काल होरेश हुआ। वर्षेशादिबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | १ | ० | ० | ० | ० | अंश |
| ० | ० | ३० | ० | १५ | ० | ४५ | कला |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | विकला |
| नतोन्नतबल + पक्षबल + त्रिभागबल + वर्षेशादिबल = कालबल। |
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२३ कालबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | १ | २ | १ | २ | १ | १ | अंश |
| ५४ | ५४ | १७ | ३८ | २७ | १२ | ३२ | कला |
| ५० | ५२ | ५२ | २५ | ० | ० | ५२ | विकला |
| अयनबलसाधन- | |||||||
| आधाने चित्रवेशे तु त्रिंशच्छरजलकराः । | |||||||
| सायनांशग्रहभुजराशीनिष्खब्धिभिः सुरैः ।।२१।। | |||||||
| सूर्यैर्हत्वा क्रमाद्राशिभागः स्यादा्नुपातः । | |||||||
| एवं राश्यादिके युंज्यादर्करायोर्शनः सु च ।।२२।। | |||||||
| राशित्रयमथो युंज्यान्मेषादिस्थेषु तेष्वथ । | |||||||
| तुलादिस्थेषु राश्यादींस्त्रिराशिभ्यस्तु वर्जयेत् ।।२३।। | |||||||
| चन्द्राकर्योर्विपरीतं स्यात्सदा युंज्याद्बुधस्य तु । | |||||||
| भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं ग्रहाणामयनं बलम् ।।२४।। | |||||||
| अयनांश युत ग्रह के भुज राशि के तुल्य ध्रुवांक से ४५।३३।१२ गुण कर | |||||||
| ३० से भाग देकर लब्धि में गतखंड को जोड़कर राश्यादि बनाकर तुलादि ६ राशि | |||||||
| में ३ घटा देना मेषादि ६ राशि में हो तो ३ जोड़ देना। परन्तु चन्द्र शनि में विलोम | |||||||
| करना अर्थात् तुलादि में जोड़ना और मेषादि में घटाना, बुध में सर्वदा ३ राशि | |||||||
| जोड़ना और अंश करके ३ से भाग देने से अयनबल होता है किन्तु सूर्य के बल | |||||||
| को दूना करने से अयन बल होता है। २१+२४। | |||||||
| उदाहरण- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने | |||||||
| से ४।१०।१७।५२ हुआ इसका भुज बनाने से १।१९।४२।८ हुआ, यहाँ पूर्वोक्त | |||||||
| नियम के अनुसार १ राशि का ध्रुवांक ३३ प्राप्त हुआ, इससे अंश कला विकला | |||||||
| को गुण देने से ६५१।६।२४ हुआ इसमें गतखंड ४५ को जोड़ देने से | |||||||
| ९६।६।२४ इसका राशि कर मेषादि में होने से ३ राशि जोड़कर राशि के अंश | |||||||
| बनाकर इसमें ३ का भाग देने से लब्ध ६२।२।२ यह सूर्य का अयन बल हुआ | |||||||
| इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी साधन करना। | |||||||
| अयनबलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | बं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
| :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: | :-: |
| १२४ | १ | १७ | ४६ | ४२ | ५९ | ५३ | अंश. |
| ४ | ५१ | ११ | ० | ३८ | ११ | ५९ | कला |
| ४४ | ३० | ४३ | ४५ | ५० | १५ | ४७ | विकला |
६२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युद्धादिबल- रवेर्द्विगुणमेवं स्याद्युध्यतोर्ग्रहयोरथ । विश्लेषं बलयोश्चापि निर्जितस्य बलं भवेत् ॥२५॥ अपनीते योजिते तु जितस्य च बलं भवेत् । ग्रहयुद्ध का लक्षण-जन्मकाल में भौमादि ग्रहों में जो दो ग्रह राशि अंश कला विकलादि से आपस में तुल्य हों उनका परस्पर युद्ध होता है। ऐसे युद्ध करने वाले दोनों ग्रहों के बलैक्य का अंतर करना जिसका बल अधिक हो वह विजयी और जिसका बल कम हो वह निर्जित अर्थात् पराजित कहा जाता है। बलैक्य में अंतर के अंक को घटाने से दक्षिण दिशा के निर्जित ग्रह का बल होता है। और जित ग्रह के बलैक्य में अंतर को जोड़ने से जित ग्रह का उत्तर दिशा का बल होता है। गतिबल- षष्ठिर्वक्रगतेर्वीर्यमनुवक्रगतेर्दलम् ॥२६॥ पादं विकलभुक्तैः स्याद्दलमेव समागमे । पादं मंदगतेस्तस्य दल मन्दतरस्य च ॥२७॥ शीघ्रभुक्तेस्तु पादोनं दलशीघ्रतरस्यतु । वक्रगति का ६० बल, मार्गीगति का ३० बल, सूर्य के साथवाले ग्रह का १५ बल, चन्द्र के साथवाले ग्रह का ३० बल, मंदगति ग्रह का १५ बल, पूर्व से अल्पगति वाले ग्रह का ७।३० बल, शीघ्रगति ग्रह का ४५ बल और अतिशीघ्र गति वाले ग्रह का ३० बल होता है।।२७।। चेष्टाबल- मध्यमस्फुटविश्लेषदलयुक्तोनितं स्फुटात् ॥२८॥ मध्यम ग्रह और स्पष्ट ग्रह के अंतर का आधा कर मध्यम ग्रह में यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से अधिक हो तो जोड़ देना, अन्यथा यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से न्यून हो तो मध्यम ग्रह में अंतरार्ध को घटा देना।।२८।। मध्यमे त्वधिके न्यूने शीघ्रादत्रास्फुटं त्यजेत् । चेष्टाकेन्द्रं भखेटानां रवीन्द्वोरयनांशयुक् ॥२९॥ इसे शीघ्रोच्च में घटा देने से शेष चेष्टाकेन्द्र होता है किन्तु यह विधि तारा ग्रह भौमादि के लिये ही है।।२९।।
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२५ अंगाधिकेऽर्कात्संशोध्य भागीकृत्य त्रिभिर्भजेत् । सूर्यचन्द्रौ सत्रिराशी कृत्वा प्रोक्तविधिस्तथा ।।३०।। एवं चेष्टाबलं प्रोक्तं नैसर्गिकमथो शृणु। और चेष्टाकेन्द्र ६ राशि से अधिक हो तो १२ राशि में घटाकर अंशादि बनाकर ३ से भाग देने से चेष्टा वल होता है। रवि चन्द्र के चेष्टा केन्द्र ६ राशि से अधिक होते हुये भी ३ राशि और अयनांश जोड़कर १२ राशि में घटाकर शेष विधि यथावत् करने से चेष्टा बल होता है।।३०।। उदाहरण- संवत् २०१३ श्रावण कृष्ण १३ शनौ अहर्गणः २७५० चक्रम् ३९ इस पर से इष्टकालिक मध्यम ग्रह निम्नलिखित हैं। इष्टकालिक मध्यमग्रह इष्टकालिक स्पष्टग्रह
| सू. | चं. | मं. | बु.के. | बृ.शु. | के. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | १० | १ | ४ | ६ | ७ |
| १९ | २४ | ३ | १० | १५ | २८ | ५ |
| ३९ | १४ | ४३ | ८ | ११ | ४६ | १ |
| १५ | ५७ | ३४ | ११ | ३२ | २ | ४२ |
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | १० | ४ | ४ | २ | ७ |
| १८ | २२ | १२ | ५ | १२ | २ | २ |
| २६ | ३० | ३२ | २२ | ५ | ३ | ४० |
| ३४ | ४७ | ८ | ५९ | ५४ | ५ | ५२ |
भौम आदि के शीघ्रोच्च
| मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|
| ३ | ४ | ३ | ६ | ३ |
| १९ | २९ | १९ | १७ | १९ |
| ३९ | ४७ | ३९ | २० | ३९ |
| ४५ | १२ | ४५ | २ | ४५ |
अयनांश = २१।५१।१८ स्पष्ट भौम = १०।१२।३२।८ मध्य भौम = १०।२।४२।३४ दोनों अंतर करने से राश्यादि = ०।९।४१।३४ इसका आधा = ०।४।५४।४७ मध्यमग्रह में अन्तरार्ध को घटाने से १०।२।४२।३४ ०।४।५४।४७ शेष = ९।२७।७।४७ इसे ३।१९।३९।४५ शीघ्रोच्च में घटाने से ५।२१।५१।५८ चेष्टाकेन्द्र हुआ इसका अंश बनाकर ३ से भाग देने से ३)१७१।१७।५८(५७।१७।१९
६२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यह भौम का अंशादि चेष्टाबल हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी चेष्टाबल साधन करना चाहिये। मध्यम चेष्टाबलचक्र
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४५ | ५० | ५७ | १० | ८ | २७ | ३४ | अंश |
| ५७ | २० | १७ | ४५ | ७ | ८ | ४० | कला |
| २७ | ३३ | १९ | १६ | ३ | १२ | ४७ | विक. |
| अयनबल + चेष्टाबल = स्पष्ट चेष्टाबल | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | |
| १७० | ५२ | ७४ | ५६ | ५३ | ८६ | ८८ | |
| १ | १२ | २८ | ४६ | ४५ | १९ | ४० | |
| ३१ | ३ | ४९ | १ | ५३ | २७ | ३४ | |
| नैसर्गिकबल- | |||||||
| षष्टिरेकेषवः सप्तदश षड्विंशतिस्ततः ।।३१।। | |||||||
| चतुस्त्रिंशत्त्रिवेदांकाः सूर्यादीनांनिसर्गजाः । | |||||||
| सूर्यादि का क्रम से ६०।५१।१७।२६।३४।४३।९ नैसर्गिक (स्वाभाविक) | |||||||
| बल होता है।।३१।। | |||||||
| नैसर्गिकबलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | |
| १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| ० | ५१ | १७ | २६ | ३४ | ४३ | ९ | |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| ग्रहों का षड्बलैक्य- | |||||||
| शुभपापदृगब्ध्यंशयुतहीनान्वितानि च ।।३२।। | |||||||
| षड्बलानि ग्रहाणां स्युरेवमेकीकृतानि तु । | |||||||
| पूर्वोक्त पाँच बलों (स्थानबल, कालबल, दिग्बल, निसर्गवल, चेष्टाबल) के | |||||||
| योग में शुभग्रह पापग्रह के दृष्टियोग के चतुर्थांश को जोड़ने और घटाने से (शुभग्रह | |||||||
| का दृष्टियोग पापग्रह के दृष्टियोग से अधिक हो तो धन करना अन्यथा ऋण करना) | |||||||
| स्पष्ट षड्बलैक्य होता है।।३२।। शेष चक्र से स्पष्ट है। |
अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६२७ षड्वलैक्यचक्र।
| सू. | चं. | म. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | ३ | ३ | ३ | २ | १ | स्थान |
| १५ | ४८ | ५ | ५६ | २९ | ५१ | ३३ | बल |
| ११ | ३० | ० | ४७ | ५२ | ४१ | ११ | |
| १ | १ | ० | १ | १ | १ | २ | काल |
| ३२ | २७ | २७ | १ | ३४ | १९ | ५५ | बल |
| १४ | ४८ | ४७ | २१ | ५६ | ५६ | ६ | |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | द्रेष्काण |
| १५ | ४२ | २६ | ५ | ८ | ४९ | २५ | बल |
| ३९ | ५४ | १८ | ५ | २० | ४८ | ३ | |
| १ | १ | १ | ० | ० | १० | १ | |
| ४३ | ५२ | १४ | ५६ | ५० | ३६ | २८ | दिग्बल |
| ५० | ४१ | २८ | ४५ | ५५ | १८ | ३९ | |
| १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | चेष्टा |
| ० | ५१ | १७ | २३ | ३४ | ४३ | ९ | बल |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| ७ | ७ | ५ | ६ | ६ | ७ | ६ | निसर्ग |
| ४६ | ४२ | २७ | २२ | ३८ | २० | ३१ | बल |
| ५४ | ५८ | ३६ | ४३ | ७ | ४४ | १ | |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| २१ | ८ | ३६ | ९ | १७ | ६ | १८ | दृग्बल |
| ३० ऋ. | २१ ऋ. | ४९ ध. | ४१ ध. | ३५ ऋ. | २० ध. | १३ ध. | |
| ७ | ७ | ६ | ६ | ६ | ७ | ६ | |
| २५ | ३४ | ४ | ० | २० | २७ | ४८ | षड्बल |
| २७ | ३७ | २२ | २ | २८ | ४ | २४ |
भावबल- शुभदृष्टि चतुर्थांशं युतं स्वमार्यदर्शनैः ।।३२।। हीनयुतं दृग्बव्यंशैर्युतं स्वामिबलं भवेत् । जिन भावां के जो स्वामी हैं उनके जो शुभ पापग्रहों से दृष्टि का अंतर करके अंतर का चतुर्थांश करके शुभग्रह दृष्टि अधिक हो योग और पापदृष्टि अधिक हो तो अंतर करने से भावबल होता है।।३२।।
६२८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । परन्तु यह उन्हीं भावों के स्वामियों के लिये हैं जिन पर बुध, गुरु की दृष्टि है।।३२।। विशेषसंस्कारः- गुरुंज्ञाभ्यां तु युक्तस्य पूर्णमेकं तु योजयेत् ।।३३।। मंदाररवियुक्तस्य बलमेकेन वर्जितम् । जिस भाव में गुरु और बुध होवें उस भावबल में १ जोड़ देना यदि शनि मंगल युत हों तो १ घटाने से भावफल होता है।।३३।। कालविशेषे बलाधिक्यता- दिवा शीर्षोदयाश्चैव संध्यामुभयोदयः ।।३४।। नक्तं पृष्ठोदयाश्चैव बलाधिक्यम् उदीरिताः । दिन में जन्म हो तो शीर्षोदय राशि के भाव अर्थात् मिथुन, तुला, सिंह, कन्या, वृश्चिक, कुम्भ के भाव बली होते हैं। संध्या समय में उभयादय मीन राशि बलवान् और रात्रि में मेष, वृष, कर्क, मकर और धन ये बलवान् होते हैं।।३४।। भानां दिग्बलम् - नृयुग्मजूकपाथोनचापपूर्वार्धकुंभभात् ।।३५।। भावबल विचार में यदि भाव में कन्या, मिथुन, तुला, कुम्भ और धन का पूर्वार्ध हो तो उसमें सप्तम भाव को ।।३५।। मृगचापपरार्धाख्यमेषसिंहवृषादपि । अलेः कर्कटकाच्चापि मृगांत्यार्धाच्चामीनभात् ।।३६।। यदि मकर का पूर्वार्ध और धन का उत्तरार्ध मेष, सिंह, वृष हो तो चतुर्थ भाव को, यदि वृश्चिक, कर्क हो तो उसमें लग्न को, यदि मकर का उत्तरार्ध और मीन हो तो उसमें दशम भाव को घटाकर।।३६।। अस्तं सुखं क्रमाल्लग्नं खं हित्वांगाधिके सति । चक्राद्विशोध्यरामैश्च भजेद्भागीकृतं बलात् ।।३७।। भावानां च ग्रहाणां च बलान्येवं विदुर्बुधाः । शेष ६ राशि से अधिक हों तो उसे १२ में घटाकर शेष का अंश बनाकर उसमें ३ से भाग देने से लब्धि भावबल होता है।।३७।। इस प्रकार भाव ग्रहों का बल पण्डितों ने कहा है।