बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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अथ द्वितीयोऽध्यायः। ६१५ दृग्बलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ° | ° | ° | ° | ° | ° | ° | अंश |
| २१ | ८ | ३३ | ९ | १७ | ६ | १८ | क. |
| २७ | २१ | ४८ | ४१ | ३५ | २० | १३ | विक |
| ऋ. | ऋ. | ध. | ऋ. | ऋ. | ध. | ध. | सं. |
| शराधिके विनाराशिं भागाद्विघ्नाश्च दृष्टयः । | |||||||
| वेदाधिके त्यजेद्भूताद्भागाद्दृष्टिस्त्रिभाधिके ॥४॥ | |||||||
| यदि शेष ५ से अधिक बचे तो राशि को छोड़कर शेष अंशादि को दूना करने | |||||||
| से दृष्टि होती है। चार से अधिक शेष बचे तो ५ में घटा दे शेष राशि को छोड़कर | |||||||
| अंशादि दृष्टि होती है॥४॥ | |||||||
| विशोध्यार्णवतो द्वाभ्यां लब्धस्त्रिंशद्युतं भवेत् । | |||||||
| कराधिके विनाराशिं भागास्तिथियुतं भवेत् ॥५॥ | |||||||
| यदि शेष तीन से अधिक बचे तो उसे चार राशि में घटाकर दो से भाग देकर | |||||||
| लब्ध में ३० जोड़ देने से दृष्टि होती है। शेष दो से अधिक हो तो राशि को छोड़कर | |||||||
| अंश में १५ जोड़ देने से दृष्टि होती है॥५॥ | |||||||
| रूपाधिके बिना राशिं भागा द्वाभ्यांविभाजिताः । | |||||||
| त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे क्रमादथ ॥६॥ | |||||||
| शरवेदा खरामाश्च तिथयो योजिताः क्रमात् । | |||||||
| शनिदेवेज्य भौमानामादौ दृष्टिः स्फुटा भवेत् ॥७॥ | |||||||
| यदि द्रष्टा दृश्य का अन्तर एक से अधिक हो तो राशि को छोड़कर अंशादि | |||||||
| को २ से भाग देने से लब्धि तुल्य दृष्टि होती है। शनि की तृतीय दशम दृष्टि हो | |||||||
| तो ४५, गुरु के त्रिकोण दृष्टि में ३० और मंगल के चतुरस्र (४।८) दृष्टि में दृष्टि | |||||||
| फल में १५ और जोड़ देने से स्पष्ट दृष्टि होती है॥६-७॥ | |||||||
| उदाहरण- जैसे द्रष्टा सूर्य राश्यादि ३।१८।२६।३४ दृश्य भौम राश्यादि | |||||||
| १०।१२।३२।८ दृश्य में द्रष्टा को घटाने से शेष राश्यादि ६।२४।५।३४ हुआ | |||||||
| यह ६ से अधिक है अतः इसे १० में घटाने से शेष राश्यादि ३।५।५४।२६ | |||||||
| हुआ राशि का अंश बनाकर अंश जोड़कर २ से भाग देने लब्धि ०।४७।५८ यह | |||||||
| भौम पर सूर्य की दृष्टि हुई इसी प्रकार अन्य ग्रहों का दृष्टि साधन करना शेष चक्र | |||||||
| से स्पष्ट है। | |||||||
| उच्चबल साधन। | |||||||
| नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् । | |||||||
| भागीकृत्य त्रिभिर्भक्तं फलमुच्चबलं भवेत् ॥८॥ |