बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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६१४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ दृष्टिवलसाधनम् – दृश्याद्विशोध्य द्रष्टारं षड्राशिभ्योऽधिकंभवेत् । दिग्भ्यो विशोध्य द्वाभ्यां तु भागीकृत्य चदृष्टयः ॥३।। जो ग्रह जिस ग्रह को देखता हैं उसे द्रष्टा कहते हैं; जिसे देखता हैं उसे दृश्य कहते हैं। दृश्य ग्रह में द्रष्टाग्रह को घटा देना शेष राशि स्थान में ६ से अधिक बचे तो उसे १० में घटाकर शेष में दो से भाग देने से दृष्टि होती है।।३।। द्रष्टाग्रह।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४५<br>४५ |
| चं. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>२०<br>२ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>३५<br>६ |
| मं. | ०<br>४७<br>५८ | ०<br>५०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>५६<br>२६ | ०<br>५९<br>२२ | ०<br>२४<br>४६ | ०<br>५६<br>५ |
| बु. | ०<br>०<br>० | ०<br>६<br>२६ | ०<br>४५<br>४१ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>१८<br>५९ | ०<br>५४<br>३६ |
| बृ. | ०<br>०<br>० | ०<br>१०<br>१० | १<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>२५<br>४७ | ०<br>३९<br>४० |
| शु. | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४०<br>२९ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>४५<br>१८ |
| श. | ०<br>३७<br>५२ | ०<br>०<br>० | ०<br>१९<br>५६ | ०<br>४२<br>१७ | ०<br>११<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० |
| शुभ-<br>योग | ०<br>०<br>० | ०<br>१६<br>३६ | २<br>४६<br>१२ | ०<br>०<br>० | ०<br>०<br>० | ०<br>५०<br>६ | २<br>३४<br>४१ |
| पाप-<br>योग | १<br>२५<br>५० | ०<br>५०<br>० | ०<br>१९<br>५६ | १<br>३८<br>४३ | १<br>१०<br>२२ | ०<br>३४<br>४६ | १<br>४१<br>५० |