भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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पृष्ठ 621

अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१९ स्थानबलचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
अंश
२५४८५७५६५९२४कला
११३०४७५२१९४०विकला
दिग्बल।
अर्कात्कुजात्सुखं जीवाज्ज्ञाच्चास्तं लग्नमार्कतः ।
मध्यलग्नं भृगोश्चंद्राद्वित्वा षड्भाधिके सति ।।१३।।
चक्राद्विशोध्य रामाप्तं भागीकृत्य च तद्बलम् ।
सूर्य और मंगल से सुखभाव को, गुरु और बुध से सप्तम भाव को, शनि
से लग्न को, शुक्र और चन्द्र से दशम लग्न को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक
हो तो।।१३।।
इसको १२ राशि में घटाकर शेष का अंश कर ३ से भाग देने से दिग्बल
होता है।।१३।।
दिग्बलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
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१५४२२६४९२५अंश
३९५९१८५०२०४८कला
१०२५५८५५१४३९विकला
कालबल नतोन्नबल।
आमध्याह्नादर्धरात्राद्विवारात्रिरिति क्रमात् ।।१४।।
अर्कभार्गवसूरीणांद्विघ्ना नाड्योर्गता दिवा ।
भौमचन्द्रशनीनां तु षष्ठिभ्यो वर्जयेदिमाः ।।१५।।
मध्याह्न से अर्धरात्रि के अन्दर इष्टकाल हो तो नत को दूना करने से सूर्य,
शुक्र और गुरु का नतवल होता हैं और इसे ६० में घटाने से मंगल, चन्द्र, शनि
का दिवावल होता है। अर्धरात्रि से मध्याह्न के अंतर का इष्टकाल हो तो उन्नत घटी
का दूना करने से चन्द्र, मंगल शनि का रात्रिवल होता है और इसे ६० में घटाने
से सूर्य, शुक्र, गुरु का रात्रिवल कलात्मक होता है और बुध का सदैव १ अंशवल
होता है।।१४-१५।।
उदाहरण- नतकाल १३।१३।३० को २ से गुण देने से २६।२७ यह
चन्द्रमा, भौम शनि का बल हुआ और उन्नत घट्यादि १६।४७।३० को दो से
गुण देने से सूर्य, गुरु, शुक्र का बल हुआ शेष चक्र में स्पष्ट है।