बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
DevanagariHindipublished800 पृष्ठ
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अथ द्वितीयोऽध्यायः । ६१९ स्थानबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | २ | २ | ३ | ३ | ३ | २ | अंश |
| २५ | ४८ | ५७ | ५६ | ५९ | ८ | २४ | कला |
| ११ | ३० | ८ | ४७ | ५२ | १९ | ४० | विकला |
| दिग्बल। | |||||||
| अर्कात्कुजात्सुखं जीवाज्ज्ञाच्चास्तं लग्नमार्कतः । | |||||||
| मध्यलग्नं भृगोश्चंद्राद्वित्वा षड्भाधिके सति ।।१३।। | |||||||
| चक्राद्विशोध्य रामाप्तं भागीकृत्य च तद्बलम् । | |||||||
| सूर्य और मंगल से सुखभाव को, गुरु और बुध से सप्तम भाव को, शनि | |||||||
| से लग्न को, शुक्र और चन्द्र से दशम लग्न को घटाकर शेष ६ राशि से अधिक | |||||||
| हो तो।।१३।। | |||||||
| इसको १२ राशि में घटाकर शेष का अंश कर ३ से भाग देने से दिग्बल | |||||||
| होता है।।१३।। | |||||||
| दिग्बलचक्र। | |||||||
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| १५ | ४२ | २६ | ५ | ८ | ४९ | २५ | अंश |
| ३९ | ५९ | १८ | ५० | २० | ४८ | ३ | कला |
| १० | २५ | ५८ | ५५ | १४ | ३९ | ७ | विकला |
| कालबल नतोन्नबल। | |||||||
| आमध्याह्नादर्धरात्राद्विवारात्रिरिति क्रमात् ।।१४।। | |||||||
| अर्कभार्गवसूरीणांद्विघ्ना नाड्योर्गता दिवा । | |||||||
| भौमचन्द्रशनीनां तु षष्ठिभ्यो वर्जयेदिमाः ।।१५।। | |||||||
| मध्याह्न से अर्धरात्रि के अन्दर इष्टकाल हो तो नत को दूना करने से सूर्य, | |||||||
| शुक्र और गुरु का नतवल होता हैं और इसे ६० में घटाने से मंगल, चन्द्र, शनि | |||||||
| का दिवावल होता है। अर्धरात्रि से मध्याह्न के अंतर का इष्टकाल हो तो उन्नत घटी | |||||||
| का दूना करने से चन्द्र, मंगल शनि का रात्रिवल होता है और इसे ६० में घटाने | |||||||
| से सूर्य, शुक्र, गुरु का रात्रिवल कलात्मक होता है और बुध का सदैव १ अंशवल | |||||||
| होता है।।१४-१५।। | |||||||
| उदाहरण- नतकाल १३।१३।३० को २ से गुण देने से २६।२७ यह | |||||||
| चन्द्रमा, भौम शनि का बल हुआ और उन्नत घट्यादि १६।४७।३० को दो से | |||||||
| गुण देने से सूर्य, गुरु, शुक्र का बल हुआ शेष चक्र में स्पष्ट है। |