बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युग्मायुग्मबल- द्वाविन्दुशुक्रौ युग्मांशे तिथिरोजांशगाः परे ।।१०।। चन्द्रमा और शुक्र समराशि या समराशि के नवांश में हों तो १५ बल अर्थात् दोनों में हो तो ३० बल पाते हैं, अन्य ग्रह सूर्य, भौम, बुध, गुरु, शनि ये विषम राशि या विषम राशि के नवांश में हों तो १५ बल पाते हैं।।१०।। युग्मायुग्मबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | अंश |
| १५ | ० | १५ | १५ | १५ | ० | १५ | कला |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | विकला |
केन्द्रादि द्रेष्काणबल- केन्द्रादिषुस्थिता लग्नात्षष्टिस्त्रिंशत्तिथिः क्रमात् । आदिमध्यावसानेषु द्रेष्काणेषु स्थिताः क्रमात् ।।११।। केन्द्रादि अर्थात् केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम में ग्रह हो तो क्रम से ६०, ३० १५ बल पाता है।।११।। पुंन्नपुंसकयोषाख्या दद्युस्तिथिबलं ग्रहाः । स्वषड्वर्गगतास्त्रिंशदेवं स्थानबलं विदुः ।।१२।। पुरुष ग्रह (सूर्य, भौम, गुरु) प्रथम द्रेष्काण में, नपुंसक ग्रह (बुध, शनि) दूसरे द्रेष्काण में और स्त्रीग्रह (चंद्र, शुक्र) तीसरे द्रेष्काण में १५ बल पाते हैं। विशेष- यदि ग्रह अपने षड्वर्ग में हों तो द्रेष्काण में ३० बल पाता है। इस प्रकार पूर्व के सभी बलों को मिलाने से ग्रह का स्थान बल होता है।।१२।।
केन्द्रादिबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | १५ | ३० | ३० | ३० | १५ | ३० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
द्रेष्काणबलचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | १५ | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
उच्चबल + सप्तवर्गजबल + युग्मायुग्मबल + केन्द्रादिबल + द्रेष्काणबल = स्थान बल।