भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

६२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । युद्धादिबल- रवेर्द्विगुणमेवं स्याद्युध्यतोर्ग्रहयोरथ । विश्लेषं बलयोश्चापि निर्जितस्य बलं भवेत् ॥२५॥ अपनीते योजिते तु जितस्य च बलं भवेत् । ग्रहयुद्ध का लक्षण-जन्मकाल में भौमादि ग्रहों में जो दो ग्रह राशि अंश कला विकलादि से आपस में तुल्य हों उनका परस्पर युद्ध होता है। ऐसे युद्ध करने वाले दोनों ग्रहों के बलैक्य का अंतर करना जिसका बल अधिक हो वह विजयी और जिसका बल कम हो वह निर्जित अर्थात् पराजित कहा जाता है। बलैक्य में अंतर के अंक को घटाने से दक्षिण दिशा के निर्जित ग्रह का बल होता है। और जित ग्रह के बलैक्य में अंतर को जोड़ने से जित ग्रह का उत्तर दिशा का बल होता है। गतिबल- षष्ठिर्वक्रगतेर्वीर्यमनुवक्रगतेर्दलम् ॥२६॥ पादं विकलभुक्तैः स्याद्दलमेव समागमे । पादं मंदगतेस्तस्य दल मन्दतरस्य च ॥२७॥ शीघ्रभुक्तेस्तु पादोनं दलशीघ्रतरस्यतु । वक्रगति का ६० बल, मार्गीगति का ३० बल, सूर्य के साथवाले ग्रह का १५ बल, चन्द्र के साथवाले ग्रह का ३० बल, मंदगति ग्रह का १५ बल, पूर्व से अल्पगति वाले ग्रह का ७।३० बल, शीघ्रगति ग्रह का ४५ बल और अतिशीघ्र गति वाले ग्रह का ३० बल होता है।।२७।। चेष्टाबल- मध्यमस्फुटविश्लेषदलयुक्तोनितं स्फुटात् ॥२८॥ मध्यम ग्रह और स्पष्ट ग्रह के अंतर का आधा कर मध्यम ग्रह में यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से अधिक हो तो जोड़ देना, अन्यथा यदि मध्यम ग्रह स्पष्ट ग्रह से न्यून हो तो मध्यम ग्रह में अंतरार्ध को घटा देना।।२८।। मध्यमे त्वधिके न्यूने शीघ्रादत्रास्फुटं त्यजेत् । चेष्टाकेन्द्रं भखेटानां रवीन्द्वोरयनांशयुक् ॥२९॥ इसे शीघ्रोच्च में घटा देने से शेष चेष्टाकेन्द्र होता है किन्तु यह विधि तारा ग्रह भौमादि के लिये ही है।।२९।।