भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

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पृष्ठ 628

६२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । यह भौम का अंशादि चेष्टाबल हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहों का भी चेष्टाबल साधन करना चाहिये। मध्यम चेष्टाबलचक्र

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रह
४५५०५७१०२७३४अंश
५७२०१७४५४०कला
२७३३१९१६१२४७विक.
अयनबल + चेष्टाबल = स्पष्ट चेष्टाबल
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
:---::---::---::---::---::---::---:
१७०५२७४५६५३८६८८
१२२८४६४५१९४०
३१४९५३२७३४
नैसर्गिकबल-
षष्टिरेकेषवः सप्तदश षड्विंशतिस्ततः ।।३१।।
चतुस्त्रिंशत्त्रिवेदांकाः सूर्यादीनांनिसर्गजाः ।
सूर्यादि का क्रम से ६०।५१।१७।२६।३४।४३।९ नैसर्गिक (स्वाभाविक)
बल होता है।।३१।।
नैसर्गिकबलचक्र।
सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
:---::---::---::---::---::---::---:
५११७२६३४४३
ग्रहों का षड्बलैक्य-
शुभपापदृगब्ध्यंशयुतहीनान्वितानि च ।।३२।।
षड्बलानि ग्रहाणां स्युरेवमेकीकृतानि तु ।
पूर्वोक्त पाँच बलों (स्थानबल, कालबल, दिग्बल, निसर्गवल, चेष्टाबल) के
योग में शुभग्रह पापग्रह के दृष्टियोग के चतुर्थांश को जोड़ने और घटाने से (शुभग्रह
का दृष्टियोग पापग्रह के दृष्टियोग से अधिक हो तो धन करना अन्यथा ऋण करना)
स्पष्ट षड्बलैक्य होता है।।३२।। शेष चक्र से स्पष्ट है।
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