भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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द्वादशभावविचाराध्यायः १५५ यदि धनेश एवं लाभेश छठें, आठवें, बारहवें भाव में हो और ११वें भाव में भौम, धन भाव में राहु हो तो राजदंड से धन का नाश होता है।।४१।। लाभे जीवे धने शुक्रे तदीशे शुभसंयुते । व्यये शुभग्रहयुते धर्ममूलाद्धनव्ययः ।।४२।। ११वें भाव में गुरु, दूसरे भाव में शुक्र हो और धनेश शुभग्रह से युत हो और बारहवें भाव में शुभग्रह हो तो धर्म के कारण द्रव्य का व्यय होता है।।४२।। कुटुम्बराशेरधिपः ससौम्ये केन्द्रत्रिकोणे च सुहद्गृही वा। सौम्यर्क्षयुक्तो यदि जातपुण्यः कुटुम्बसंरक्षणवाग्विभूतः ।। द्वितीय भाव का स्वामी शुभग्रह से युक्त होकर केन्द्र-त्रिकोण में मित्र क्षेत्र में वा अपनी राशि में वा शुभग्रह की राशि में हो तो पुण्यवान् कुटुम्ब की रक्षा करने वाला होता है।।४३।। कुटुम्बनाथे परमोच्चयुक्ते देवेन्द्रपूज्ये च समीक्षिते वा । तथाविधे तद्भवनेऽभिजातः सहस्ररक्षो भुवनप्रतापी ।।४४।। धनेश अपने उच्च में हो और गुरु से देखा जाता हो तो सहस्र द्रव्य कों रखने वाला होता है।।४४।। तन्नाथे भृगुणा बुधेन सहिते पारावतांशे तथा स्वोच्चेनाथ सुहद्गृहे धनपतौ स्वस्थानकोलाहलः ।।४५।। धनेश शुक्र-बुध से युक्त हो, पारावतांश में हो, अपने उच्च मित्र के गृह में हो तो प्रसिद्ध धनी होता है।।४५।। कुटुम्बराशिस्थपतौ यदि स्याद्भृगौ बुधे तादृशभावनाथे । स्वोच्चे सुहत्क्षेत्रगतेऽथवा स्यात्परोपकारी जनरक्षकः स्यात् ।। धनेश शुक्र वा बुध अपने उच्च मित्र के गृह में हो तो परोपकारी जनरक्षक होता है।।४६।। नेत्रेशे बलसंयुक्ते शोभनाक्षो भवेन्नरः । षष्ठाष्टमव्यये युक्ते नेत्रे वैकल्यमादिशेत् ।।४७।। धनेश बलवान् हो तो सुंदर नेत्रों वाला होता है। यदि छठे, आठवें, बारहवें भाव में हो तो नेत्र में विकारवाला होता है।।४७।।