भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

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१५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गुरु और द्वितीयेश छठे, आठवें, बारहवें भाव में हों तो मूक (गूंगा) होता है। इसी प्रकार पिता, माता आदि के भावेश हों तो उन्हें भी मूक कहना चाहिए।।३४।। विद्याधिपौ जीवबुधावविद्यामरिद्ग्यस्थौ कुरुतोऽथ तौ चेत्। केन्द्रत्रिकोणस्थगृहोच्चसंस्थौ प्रयच्छतां द्रागनवद्यविद्याम्।। गुरु, बुध और द्वितीयेश छठे, आठवें और बारहवें भाव में हों तो मूर्ख होता है। यदि ये केन्द्र-त्रिकोण अपने गृह उच्च राशि में हों तो शीघ्र ही विद्वान् होता है।।३५।। धनाधिपो गुरुर्यस्य धनराशिस्थितो यदि। भौमेन सहितो वापि धनवान् स नरो भवेत् ।। ३६ ।। धनेश और भौम दूसरे भाव में हो तो पुरुष धनी होता है।।३६।। धनेशे लाभराशिस्थे लाभेशे वा धनङ्गते। तावुभौ केन्द्रराशिस्थौ धनवान्स नरो भवेत् ।। ३७ ।। धनेश ११वें भाव में हो और लाभेश दूसरे भाव में हो अथवा दोनों केन्द्र में हों तो धनी होता है।।३७।। धनेशे केन्द्रराशिस्थे लाभेशे तत्रिकोणगे। गुरुशुक्रयुते दृष्टे धनलाभमुदीरयेत् ।।३८।। धनेश केन्द्र में हो और लाभेश उससे त्रिकोण में हो तथा गुरु-शुक्र से युत-दृष्ट हो तो धन का लाभ होता है।।३८।। वित्तेशो रिपुभावस्थो लाभेशो तद्गतो यदि। वित्तलाभौ पापयुक्तौ दृष्टौ निर्धन एव सः।।३९।। धनेश, लाभेश छठे में हों अथवा धन-लाभ पापयुत और पापदृष्ट हों तो निर्धन होता है।।३९।। वित्तलाभाधिपौ दुःस्थौ पापखेचरसंयुतौ। जन्मप्रभृतिदारिद्र्यं भिक्षात्रं लभते नरः।।४०।। धनेश, लाभेश पापग्रह से युत होकर छठे, आठवें, बारहवें भाव में हों तो जन्म से ही दरिद्र होता है और भिक्षा माँगकर खाने वाला होता है।।४०।। षष्ठाष्टमव्ययस्थौ चेद्धनलाभाधिपौ यदि। लाभे कुजे धने राहौ राजदण्डाद्धनक्षयः।।४१।।