बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १५३ शुक्रो बुधोऽथवा जीवो लग्ने चन्द्रसमन्वितः । लग्नात्केन्द्रगतो वापि राजलक्षणसंयुतः ।।२८।। यदि शुक्र, बुध वा गुरु चन्द्रमा से युत होकर लग्न से केन्द्र में गये हों तो बालक राजलक्षण से युक्त होता है।।२८।। रविचन्द्रौ च ह्येकस्थावेकांशकसमन्वितौ। त्रिमात्रं च त्रिभिर्मासैर्भ्रात्रा पित्रा च जीवति ।।२९।। रवि-चन्द्रमा एक स्थान में एक ही अंश में हों तो बालक को तीन मास के अन्दर तीन माताएँ होती हैं और भाई पिता से जीवित रहता है।।२९।। लग्ने राहुसमायुक्ते तथा सोमनिरीक्षिते । लग्नांशे मन्दसूरी चेज्जातश्च यमलो भवेत् ।।३०।। लग्न में राहु हो, उसे चन्द्रमा देखता हो तथा लग्न के नवमांश में शनि- गुरु हों तो यमल बालक होते हैं।।३०।। अथ धनभावफलम्- शुक्रेण युक्तो यदि नेत्रनाथः शुक्रस्य स्वोच्चांशगृहे गतो वा । सम्बन्धवान्स्याद्यदि देहपेन नेत्रं विधत्ते विपरीतभावम् ।।३१।। यदि धन भाव का स्वामी शुक्र से युक्त हो और शुक्र के उच्च, नवांश, गृह में हो और लग्नेश से संबंध करता हो तो टेढ़े नेत्र होते हैं।।३१।। तत्र स्थितौ चन्द्ररवी निशान्धं जात्यन्धतां नेत्रपदेहपार्काः। पैत्रर्क्षनाथेन युतास्तदान्ध्यं कुर्वन्ति मात्रादिफलं तथेद्दक् ।।३२।। यदि चन्द्र-सूर्य धनेश-लग्नेश से युक्त होकर दुःस्थ हों तो जन्मांध होता है। पिता आदि के स्वामी युत हों तो उन्हें भी अंधा समझना चाहिए।।३२।। दोषकृन्न च सर्वत्र स्वोच्चस्वर्क्षगतो ग्रहः। षडादित्रयसंस्थश्चेत्तदा दोषकृच्छुभः।।३३।। यदि दोषकर्ता ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो दोष नहीं करता। यदि छठे, आठवें एवं बारहवें में हो तो दोष करता है।।३३।। वागीशवाग्गृहाधीशौ षडादित्रयसंस्थितौ। मूकतां कुरुतेऽप्येवं पितृमातृगृहाधिपाः।।३४।।