बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ मीनलग्नम्— मन्दशुक्रांशुमद् पापाः सौम्यो भौमविधू शुभौ। महीसुतगुरुश्चैव भवेतां योगकारको ॥३६॥ मीनलग्न वाले को शनि, शुक्र, सूर्य पाप फल देनेवाले, बुध, भौम, चंद्रमा शुभफलदायक और भौम-गुरु राजयोगकारक होते हैं ॥३६॥ भौमः मारकत्वेऽपि न हन्तामन्दज्ञौ पापिनः । इत्यूहानि फलान्येवं बुधैस्तु झषजन्मनः ॥३७॥ भौम मारकेश होते हुए भी मारता नहीं है, किन्तु शनि-बुध मारक होते हैं। इस प्रकार मीनलग्न का फल जानना चाहिए ॥३७॥ एतच्छास्त्रानुसारेण मारकान्निर्दिशेद् बुधः। चन्द्रसूर्य विना सर्वे मारकाः परिकीर्त्तिताः ॥३८॥ इस शास्त्र के अनुसार मारकेश का निर्देश करना चाहिए। रवि-चंद्र को छोड़कर शेष सभी मारकेश होते हैं ॥३८॥ स्वदशायां स्वमुक्तौ च नराणां निधनं न हि। क्वचिद्दशायामिच्छन्ति स्वभुक्तौ न कदाचन ॥३९॥ मारकेश की दशा और अन्तर्दशा में मृत्यु नहीं होती है। किसी- किसी के मत से मारकेश की दशा में मृत्यु होती है और कभी अंतर्दशा में नहीं होती है। ॥३९॥ इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां कारकमारकादिविचारो नामैकादशोऽध्यायः। अथ द्वादशभावेषु विचार्यत्वमाह तनोरूपं च ज्ञानं च वर्णं चैव बलाबलम्। शीलं वै प्रकृतिं चैव तनुस्थानाद्विचारयेत् ॥१॥ प्रथम भाव से शरीर, रूप (रंग), ज्ञान, वर्ण (ब्राह्मणादि), बल, निर्बल, शील(स्वभाव) और प्रकृति का विचार करना चाहिए ॥१॥ धनं धान्यं कुटुम्बं च मृत्युजालममित्रकम्। धातुरत्नादिकं सर्वं धनस्थानाद्विचारयेत् ॥२॥