बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशाय नमः अथ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाषा-टीकासहितम् पूर्वार्धम् श्रीगणेशं गुरुं नत्वा नत्वाम्बां सुमतिप्रदाम्। पाराशरीयहोरायाः कुर्वे टीकां सुबोधिनीम्॥१॥ मैत्रेय उवाच— नमस्तस्मै भगवते बोधरूपाय सर्वदा। परमानन्दकन्दाय गुरवेऽज्ञानध्वंसिने॥१॥ इति स्तुत्या सुसंहृष्टो मुनिस्तत्त्वविदाम्बरः। अथादिदेश सच्छास्त्रं सारं यज्ज्योतिषां शुभम्॥२॥ मैत्रेय जी ज्योतिषशास्त्र के सार पदार्थ को जानने के लिए पाराशर जी की स्तुति करते हैं। अज्ञान को नाश करने वाले परम आनन्द को देनेवाले सर्वदा ज्ञान को देनेवाले भगवन् परमपूज्य आपको नमस्कार है। इस स्तुति से तत्त्व के जानने वालों में श्रेष्ठ मुनि प्रसन्न होकर ज्योतिष (ग्रहों) के शुभ तत्त्व शास्त्र का आदेश करने लगे॥१-२॥ पराशर उवाच— शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शुक्लाम्बरधरां गिरम्। प्रणम्य पाञ्चजन्यं च वीणां याभ्यां धृतं द्वयम्॥३॥ पराशर जी बोले— सफेद वस्त्र को धारण किये हुये, पाञ्चजन्य को लिये हुये विष्णु को एवं सफेद वस्त्र को धारण किये हुये, वीणा को लिये हुये सरस्वती को प्रणाम कर॥३॥ सूर्य नत्वा ग्रहपतिं जगदुत्पत्तिकारणम्। वक्ष्यामि वेदनयनं यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्॥४॥ संसार के उत्पत्ति के कारण ग्रहों के स्वामी सूर्य को नमस्कार करके जैसा मैंने ब्रह्मा के मुख से सुना है वैसा ही वेद के नेत्र को (ज्योतिष-शास्त्र) कहूँगा॥४॥