बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् शान्ताय गुरुभक्ताय ऋजवेऽर्चितस्वामिने। आस्तिकाय प्रदातव्यं ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यति ।।५।। इस शास्त्र को शान्तस्वभाव गुरुभक्त, सीधे, स्वामीभक्त और आस्तिक को देना चाहिए। इससे कल्याण की प्राप्ति होती है।।५।। न देयं परशिष्याय नास्तिकाय शठाय च। दत्ते प्रतिदिनं दुःखं जायते नात्र संशयः।।६।। दूसरे के शिष्य को, नास्तिक और मूर्ख को नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से प्रतिदिन दुःख होता है, इसमें संशय नहीं है।।६।। अथ सृष्ट्यारम्भमाह— एकोऽव्यक्तात्मको विष्णुरनादिः प्रभुरीश्वरः। शुद्धसत्त्वो जगत्स्वामी निर्गुणस्त्रिगुणान्वितः ।।७।। एक अव्यक्त आत्मावाले विष्णु हैं जो कि अनादि, समर्थ, ईश्वर, शुद्ध सतोगुणी, जगत् के स्वामी, निर्गुण होते हुए भी तीनों गुणों से युक्त हैं।।७।। संसारकारकः श्रीमान्निमित्तात्मा प्रतापवान्। एकांशेन जगत्सर्वं सृजत्यवति लीलया ।।८।। संसार को बनाने वाले सर्व सम्पत्ति से युक्त, नियतात्मावाले, प्रतापी हैं। वे अपने एक अंश से सम्पूर्ण जगत् की लीला से ही रचना करते और पालन करते हैं।।८।। त्रिपादं तस्य देवस्य ह्यमृतं तत्त्वदर्शिभिः। विदन्ति तत्प्रमाणं च सप्रधानं तथैकपात् ।।९।। इनके तीन चरण अमृतमय हैं जिसे तत्त्वदर्शी लोग जानते हैं। प्रधान के सहित प्रमाणस्वरूप एक चरण से।।९।। व्यक्ताव्यक्तात्मको विष्णुर्वासुदेवस्तु गीयते। यदव्यक्तात्मको विष्णुः शक्तिद्वयसमन्वितः ।।१०।। व्यक्त और अव्यक्त आत्मावाले विष्णु को वासुदेव कहते हैं। जो अव्यक्त विष्णु हैं वे दो शक्तियों से युक्त हैं।।१०।। व्यक्तात्मकस्त्रिशक्तीभिः संयुतोऽनन्तशक्तिमान्। सत्त्वप्रधाना श्रीशक्तिर्भूशक्तिश्च रजोगुणः।।११।।