बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनेश लग्न में हो तो जातक पुत्रवान्, अपने कुटुम्ब का कंटक, धनी, निष्ठुर, कामी और दूसरे के कार्य में तत्पर होता है॥९॥ धनेशे धनगे मर्त्यः धनवान् गर्वसंयुतः। भार्याद्वयं त्रयं वापि पुत्रहीनः प्रजायते ॥१०॥ धनेश धनभाव में हो जातक धनी, धर्म से युक्त होता है। उसे २ या ३ स्त्रियाँ होती है और पुत्रहीन होता है॥१०॥ धनेशे सहजे तुर्ये विक्रमी मतिमान् गुणी। परदाराभिमानी च लोभी वा देवनिन्दकः ॥११॥ धनेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक पराक्रमी, बुद्धिमान्, गुणी, परायी स्त्री का अभिमान करने वाला, लोभी या देवनिंदक होता है।॥११।। धनेशे सुतभावस्थे पुत्रतो धनवान् भवेत्। कृपणो दुःखभाग्जातो यशस्वी पुत्रवान् भवेत् ॥१२॥ धनेश पाँचवें भाव में हो तो पुत्र से धनी, कृपण, दुःख भोगने वाला, यशस्वी और पुत्रवान् होता है॥१२॥ धनेशे शत्रुगे शत्रोर्धनं प्राप्नोति निश्चितम्। शत्रुतो वित्तनाशः स्याज्जंघोर्वोर्भवेच्च रुक् ॥१३॥ धनेश छठे भाव में हो तो शत्रु से धन प्राप्त करने वाला, पुत्र द्वारा धन नाश वाला और जंघा तथा उरु प्रदेश में रोग युक्त होता है॥११॥ धनेशे सप्तमे वैद्यः परजायाभिगामिनः। जाया तस्य भवेद्वेश्या माता च व्यभिचारिणी ॥१४॥ धनेश सातवें भाव में हो तो जातक वैद्य होता है, परस्त्रीगामी होता है। उसकी स्त्री वेश्या और माता व्यभिचारिणी होती है॥१४॥ धनेशे मृत्युगेहस्थे भूमिद्रव्यं लभेद् ध्रुवम्। जायासौख्यं भवेत्स्वल्पं ज्येष्ठभ्रातृसुखं न हि ॥१५॥ धनेश आठवें भाव में हो तो जातक को भूमिगत द्रव्य का लाभ, स्त्री का सुख अल्प और ज्येष्ठ भाई का सुख नहीं होता है॥१५॥ धनेशे नवमे लाभे धनवानुद्यमी पटुः। बाल्ये रोगी सुखी पश्चाद्यावदायुः समाप्यते ॥१६॥