बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावैशफलाध्यायः १९१ अथ षष्ठेशभावफलम्- षष्ठेशे सप्तमे लाभे लग्ने वा कीर्त्तिमान् भवेत्। धनवान् गुणवान् मानी साहसी पुत्रवर्जितः ।।४३।। षष्ठेश सातवें, ग्यारहवें या लग्न में हो तो जातक कीर्त्तिमान्, धनवान्, गुणी, मानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।।४३।। षष्ठेशे कर्मवित्तस्थे साहसी कुलविश्रुतः। परदेशे सुखी वक्ता स्वकर्मै चैकनिष्ठिकः ।।४४।। षष्ठेश दशम वा दूसरे भाव में हो तो जातक साहसी, कुल में विख्यात, परदेशी, वक्ता और अपने कर्म में निष्णात होता है।।४४।। षष्ठेशे सहजे तुर्ये क्रोधेनारक्तलोचनः। मनस्वी पिशुनो द्वेषी चलचित्तोऽतिवित्तवान् ।।४५।। षष्ठेश तीसरे या चौथे भाव में हो जातक का नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण का, मनस्वी, कृपण, द्वेष करने वाला, अस्थिरचित्त और अत्यंत धनी होता है।।४५।। षष्ठेशे पञ्चमे यस्य चलमित्रधनादिकम्। दयायुक्तः सुखी सौम्यः स्वकार्ये चतुरो महान् ।।४६।। पाँचवें भाव में हो तो जातक के मित्र तथा धन चंचल होते हैं। दयावान्, सुखी, सौम्यमूर्त्ति और अपने कार्य में अत्यंत चतुर होता है।।४६।। षष्ठेशे रिपुभावस्थे स्वज्ञातिः शत्रुवद्भवेत्। परजातिर्भवेन्मित्रं भूमौ न चलति ध्रुवम् ।।४७।। षष्ठेश छठे भाव में हो जातक के जातिवाले ही उसके शत्रु होते हैं, परजाति के लोग मित्र होते हैं और हमेशा सवारी से चलता है।।४७।। षष्ठेशेऽष्टमरिःफस्थे रोगी शत्रुर्मनीषिणाम्। परजायाभिगामी च जीवहिंसासु तत्परः ।।४८।। षष्ठेश ८वें या १२वें भाव में हो तो जातक रोगी और अच्छे लोगों का शत्रु, परस्त्रीगामी और हिंसक होता है।।४८।। षष्ठेशो नवमे यस्य काष्ठपाषाणविक्रयी। व्यवहारे क्वचिद्धानिः क्वचिद्वृद्धिर्भवेत्किल ।।४९।।