बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावेशफलाध्यायः १९३ द्वादशस्थे सप्तमेशे दरिद्रः कृपणो महान्। चारुकन्या भवेद्भार्या वस्त्राज्जीवी च निर्धनी ।।५६।। सप्तमेश १२वें भाव में हो तो जातक दरिद्र, अत्यंत कृपण, स्त्री सुंदरी, और वस्त्र से जीविका करने वाला निर्धन होता है।।५६।। अथाष्टमेशभावफलम्- अष्टमेशे तनौ कामे भार्यायुग्मं समादिशेत्। विष्णुद्रोहरतो नित्यं व्रणरोगी प्रजायते ।।५७।। अष्टमेश लग्न या सातवें भाव में हो तो जातक की दो स्त्रियाँ होती हैं। सदा विष्णु का द्रोह करने वाला और व्रणरोगी होता है।।५७।। धनं तस्य भवेत्स्वल्पं गतं वित्तं न लभ्यते। अष्टमेशे धने बाहुबलहीनः प्रजायते ।।५८।। अष्टमेश धनस्थान में हो तो जातक अल्प धन वाला, बाहुबल से हीन और नष्ट हुए द्रव्य को. न पाने वाला होता है।।५८।। अष्टमेशे तृतीये चेत् भ्रातृहीनो भवेन्नरः। बन्धुद्वेषी सुहृद्द्वेषी व्यङ्गो दुर्बलदेहभाक् ।।५९।। अष्टमेश तीसरे भाव में हो तो जातक भ्रातृहीन, बंधुओं से द्वेष करने वाला, अंगहीन और दुर्बल शरीर का होता है।।५९।। अष्टमेशे सुखे कर्मपिशुनो बन्धुवर्जितः। मातापित्रोर्भवेन्मृत्युः स्वल्पकालेन भीतियुक् ।।६०।। अष्टमेश चौथे भाव में हो तो जातक कर्महीन, बंधुहीन और थोड़ी अवस्था में ही मातृ-पितृविहीन होता है।।६०।। अष्टमेशे सुते लाभे तस्य वृद्धिर्न जायते। द्रव्यं न स्थीयते गेहे स्थिरबुद्धिर्भवेज्जनः।।६१।। अष्टमेश पाँचवें या ग्यारहवें भाव में हो तो जातक बुद्धिहीन, द्रव्यहीन और मूर्ख होता है।।६१।। अष्टमेशे व्यये षष्ठे नित्यं रोगी प्रजायते। जलसर्पादिकाद्घातो भवेत्तस्य च शैशवे ।।६२।। अष्टमेश छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक सदा रोगी, शैशव अवस्था में जल या सर्प भय से पीड़ित होता है।।६२।।