भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 800 में से

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पृष्ठ 192

१९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् द्यूती चौरोऽन्यथावादी गुरुनिन्दासु तत्परः। अष्टमेशेऽष्टमस्थाने भार्या पररता भवेत् ।।६३।। अष्टमेश अष्टम भाव में हो तो जातक की स्त्री दूसरे में आसक्त होती है और वह जुआड़ी, चोर, असत्य बोलने वाला और गुरु की निंदा करने वाला होता है।।६३।। अष्टमेशे तपः स्थाने महापापी च नास्तिकः। सुतहा ह्यथवा वन्ध्या परभार्याधने रुचिः ।।६४।। अष्टमेश नवम भाव में हो तो जातक महापापी, नास्तिक, पुत्रनाशक, वा वंध्या और परस्त्री एवं परधनलोलुप होता है।।६४।। अष्टमेशे स्थिते माने नीचकर्मप्रवृत्तिवान्। प्रेष्यो च जारजो क्रूरो मातृहीनो भवेन्नरः ।।६५।। अष्टमेश दशमभाव में हो तो जातक नीच कर्म में रत, दासकर्म करने वाला, जार से उत्पन्न, क्रूर और मातृसुख से हीन होता है।।६५।। अथ भाग्येशभावफलम्- भाग्येशे च मदे कल्पे गुणवान्कीर्त्तिमान्भवेत् । कदाचिन्न भवेत्सिद्धं यत्कार्यं कर्त्तुमिच्छति ।।६६ ।। भाग्येश लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक गुणी, कीर्त्तियुक्त होता है। उसे जिस कार्य की इच्छा होती है वह कभी सिद्ध नहीं होता है।।६६।। भाग्येशे सहजे वित्ते सदा भाग्यानुचिन्तकः। धनवान् गुणवान्कामी पण्डितो जनवल्लभः ।।६७।। भाग्येश तीसरे या दूसरे भाव में हो तो जातक सदा भाग्यवान्, धनी, गुणी, कामी, पंडित और जनवल्लभ होता है।।६७।। भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् । पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः ।।६८।। भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति, पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है।।६८।। भाग्येशे पञ्चमे लाभे भाग्यवान् जनवल्लभः। गुरुभक्तिरतो मानी धीरो धीरगुणैर्युतः ।।६९।।

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