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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

१९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् द्यूती चौरोऽन्यथावादी गुरुनिन्दासु तत्परः। अष्टमेशेऽष्टमस्थाने भार्या पररता भवेत् ।।६३।। अष्टमेश अष्टम भाव में हो तो जातक की स्त्री दूसरे में आसक्त होती है और वह जुआड़ी, चोर, असत्य बोलने वाला और गुरु की निंदा करने वाला होता है।।६३।। अष्टमेशे तपः स्थाने महापापी च नास्तिकः। सुतहा ह्यथवा वन्ध्या परभार्याधने रुचिः ।।६४।। अष्टमेश नवम भाव में हो तो जातक महापापी, नास्तिक, पुत्रनाशक, वा वंध्या और परस्त्री एवं परधनलोलुप होता है।।६४।। अष्टमेशे स्थिते माने नीचकर्मप्रवृत्तिवान्। प्रेष्यो च जारजो क्रूरो मातृहीनो भवेन्नरः ।।६५।। अष्टमेश दशमभाव में हो तो जातक नीच कर्म में रत, दासकर्म करने वाला, जार से उत्पन्न, क्रूर और मातृसुख से हीन होता है।।६५।। अथ भाग्येशभावफलम्- भाग्येशे च मदे कल्पे गुणवान्कीर्त्तिमान्भवेत् । कदाचिन्न भवेत्सिद्धं यत्कार्यं कर्त्तुमिच्छति ।।६६ ।। भाग्येश लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक गुणी, कीर्त्तियुक्त होता है। उसे जिस कार्य की इच्छा होती है वह कभी सिद्ध नहीं होता है।।६६।। भाग्येशे सहजे वित्ते सदा भाग्यानुचिन्तकः। धनवान् गुणवान्कामी पण्डितो जनवल्लभः ।।६७।। भाग्येश तीसरे या दूसरे भाव में हो तो जातक सदा भाग्यवान्, धनी, गुणी, कामी, पंडित और जनवल्लभ होता है।।६७।। भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् । पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः ।।६८।। भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति, पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है।।६८।। भाग्येशे पञ्चमे लाभे भाग्यवान् जनवल्लभः। गुरुभक्तिरतो मानी धीरो धीरगुणैर्युतः ।।६९।।

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१९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कर्मेशो नवमे यस्य स भवेत्कुलपालकः। सद्बन्धुमित्रसंयुक्तः मातृभक्तोऽथ पूजकः।।७७।। कर्मेश नवम भाव में हो तो जातक कुलपालक श्रेष्ठ, बन्धु-मित्र से युक्त और मातृभक्त होता है।।७७।। अथ लाभेशभावफलम्- लाभेशे संस्थिते लग्ने धनवान्सात्त्विको महान्। समदृष्टिर्महान्वक्ता कौतुको च भवेत्सदा ।।७८।। लाभेश लग्न में हो तो जातक धनी, सात्त्विक, समदृष्टि, वक्ता और कौतुकी होता है।।७८।। लाभेशे च धने पुत्रे नानासुखसमन्वितः। पुत्रवान्धार्मिकश्चैव सर्वसिद्धियुतः पुमान् ।।७९।। लाभेश दूसरे या पाँचवें भाव में हो तो जातक अनेक सुखों से युक्त, पुत्रवान्, धार्मिक और सभी पदार्थों से युक्त होता है।।७९।। लाभेशे सहजे तुर्ये तीर्थेषु तत्परो महान्। कुशलः सर्वकार्येषु केवलं शूलरोगवान् ।।८०।। लाभेश तीसरे या चौथे भाव में हो तो जातक तीर्थयात्रा में तत्पर, सभी कार्यों में कुशल और शूलरोग से युक्त होता है।।८०।। लाभेशे षष्ठभवने नानारोगसमन्वितः। सर्वं सुखं भवेत्तस्य प्रवासी परसेवकः ।।८१।। लाभेश छठे भाव में हो तो जातक अनेक रोगों से युक्त, प्रवासी और दूसरे का नौकर होता है।।८१।। लाभेशे सप्तमे रन्ध्रे भार्या तस्य न जीवति। उदारो गुणवान्कर्मी मूर्खो भवति निश्चितम् ।।८२।। लाभेश सातवें या आठवें भाव में हो तो जातक की स्त्री नहीं होती है। वह गुणी, उदार और मूर्ख होता है।।८२।। लाभेशे गगने धर्मे राजपूज्यो धनाधिपः। चतुरः सत्यवादी च निजधर्मसमन्वितः ।।८३।। लाभेश दशम या नवम भाव में हो तो जातक राजा से पूज्य, धनी, चतुर, सत्यवक्ता और अपने धर्म से युत होता है।।८३।।

भावेशफलाध्यायः १९७ लाभेशे संस्थिते लाभे स वाग्मी भवति ध्रुवम् । पाण्डित्यं कविता चैव वर्धते च दिने दिने ॥८४॥ लाभेश लाभ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान्, पंडित और कवि होता है ॥८४॥ प्राप्तिस्थानाधिपे रिःफे म्लेच्छसंसर्गकारकः । कामुको बहुकान्तश्च क्षणिको लम्पटः सदा ॥८५॥ लाभेश बारहवें भाव में हो तो जातक नीचों से संसर्ग करने वाला, कामी, अनेक स्त्रियों वाला और लम्पट होता है ॥८५॥ अथ व्ययेशभावफलम्- व्ययेशे मदने लग्ने जायासौख्यं भवेन्न हि । दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः ॥८६॥ व्ययेश सातवें या लग्न में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन-विद्या से हीन होता है ॥८६॥ व्ययेशे च धने रन्ध्रे विष्णुभक्तिसमन्वितः । धार्मिकः प्रियवादी च सम्पूर्णगुणसंयुतः ॥८७॥ व्ययेश दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक, प्रियभाषी, गुणी होता है ॥८७॥ भार्याद्वेषी प्रियद्वेषी गुरुद्वेषी भवेन्नरः । व्ययेशे सहजे धर्मे स्वशरीरस्य पोषकः ॥८८॥ व्ययेश तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक, स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है ॥८८॥ पुत्रहीनो महादुःखी तीर्थाटनपरो भवेत् । कृपणो रोगयुक्तश्च व्ययेशे च सुते सुखे ॥८९॥ व्ययेश पाँचवें या चौथे भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महादुःखी, तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है ॥८९॥ व्ययेशेऽरिव्यये पापी मातृमृत्युविचिन्तकः । क्रोधी सन्तानदुःखी च परजायासु लम्पटः ॥९०॥ व्ययेश छठें या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है ॥९०॥

१९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् व्ययेशे दशमे लाभे पुत्रसौख्यं भवेन्न हि। मणिमाणिक्यमुक्तादि धत्ते किञ्चित्समालभेत् ।।९१।। व्ययेश दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि- माणिक्य आदि के होते हुए भी सुखहीन होता है।।९१।। एतत्ते कथितं विप्र भावेशानां तु यत् फलम्। बलाबलविवेकेन सर्वेषां फलमादिशेत् ।।९२।। जो भावेशों के फल कहे गये हैं वे ग्रहों के बल-अबल के अनुसार ही होते हैं।।९२।। ग्रहे पूर्णबले प्राप्ते फलं पूर्ण समादिशेत् । अर्धमर्धबले प्राप्ते हीने पादं समादिशेत् ।।९३।। भावानां द्वादशानां च सर्वेषां फलमादिशेत् । उक्तं भावस्थितानां च भावेशानां फलं मया ।।९४।। ग्रह पूर्णबली हो तो पूर्णबल, मध्यबली हो तो आधाबल और हीनबली हो तो चतुर्थांश फल देता है।।९४।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां भावेशफलाध्यायः त्रयोदशः ।।१३।। अथ नाभसादियोगाध्यायः अधुना नाभसा योगाः कथयामि सविस्तरः। अष्टादशशतगुणितास्तेषां भेदाः समासतः ।।१।। अब मैं नाभस योगों को विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, जिनके भेद १८०० होते हैं।।१।। आश्रयाख्यास्त्रयो योगा दशयोगद्वयं ततः। आकृतिर्विंशतिः संख्या योगानां सप्तकं स्मृतम् ।।२।। जिसमें आश्रय योग ३, दल योग २, आकृति योग २० और संख्या योग ७ मुख्य हैं।।२।। तेषां नामानि- रज्जुयोगो मूसलश्च नलो मालाभुजङ्गमौ। गदायोगश्च शकटः शृङ्गाटकविहङ्गमौ ।।३।।

नाभसादियोगाध्यायः १९९ हलवज्रयवाश्चैव कमलो वापि यूपकौ। शरशक्तिदण्डनौकाकूटछत्रधनूंषि च ॥४॥ अर्धेन्दुयोगश्चक्राख्यः समुद्रश्चेति विंशतिः। वीणादामनिकायोगः पाशकेदारशूलकाः॥५॥ युगगोलो ततः प्रोक्तौ योगा द्वात्रिंशका इमे। तेषां च लक्षणं वक्ष्ये यथाबुद्धिविवेकतः॥६॥ रज्जु, मुशल, नल ये आश्रययोग हैं और मालासर्प ये दलयोग हैं। गदा, शकट, शृंगाटक, पक्षी, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप, शरशक्ति, दंड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्धचक्र, चक्र, समुद्र-ये २० आकृतियोग हैं। वीणा, दाम, पारा, केदार, शूल, युग, गोल ये ७ संख्या योग हैं। ये सभी मिलकर ३२ नाभस योग कहे जाते हैं। अब इनके लक्षण कह रहा हूँ॥३-६॥ अथाऽऽश्रययोगलक्षणम्- सर्वे चरस्था अपि वा स्थिरस्था द्विदेहसंस्था यदि वा भवन्ति। क्रमेण रज्जुर्मुशलं नलश्च योगत्रयं स्यादिदमाश्रयाख्यम्॥७॥ यदि सभी ग्रह चर राशि में हों तो रज्जुयोग, सभी स्थिर राशि में हों तो मुशल योग और सभी ग्रह द्विस्वभाव राशि में हों तो नलयोग होता है। ये तीन आश्रय योग हैं॥७॥ अथ दलयोगद्वयमाह- केन्द्रत्रये सौम्यखगैस्तु माला खलग्रहैर्व्यालसमाह्वयः स्यात्। इदं तु योगद्वितयं दलाख्यं मुनीश्वरेण प्रतिपादितं हि॥८॥ यदि किसी भी तीन केंद्रों में शुभग्रह हों तो माला योग होता है। यदि पापग्रह हों तो व्याल योग होता है। ये दोनों दल योग हैं॥८॥ अथ विंशत्याकृतियोगमाह- आसन्नकेन्द्रद्वयगैर्गदाख्यो लग्नास्तसंस्थैः शकटः समस्तैः। खबन्धुयातैर्विहगः प्रदिष्टः शृङ्गाटकं लग्ननवात्मजस्थैः॥९॥ यदि सभी ग्रह समीप के दो केंद्रों में हों तो 'गदा' योग होता है। सभी ग्रह केवल लग्न और सप्तम में हों तो शकट योग होता है। यदि सभी ग्रह दशम और चतुर्थ में हों तो 'विहग' योग होता है। सभी ग्रह लग्न नवम और पाँचवें भाव में हों तो 'शृंगाटक' योग होता है॥९॥

२०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् धनादिखस्थैस्त्रिमदायगैर्वा चतुर्थरन्ध्रव्ययसंस्थितैर्वा। नभस्तलस्थैर्हलनाम योगः किलोदितोऽयं निखिलागमज्ञैः ॥१०॥ सभी ग्रह २, ६, १०, ३, ७, ११, ४, ८, १२ हों तो 'हल' नाम का योग होता है॥१०॥ लग्नस्मरस्थानगतैः शुभाख्यैः पापैश्च मेषूरणबन्धुयातैः । वज्राभिधस्तैर्विपरीतसंस्थैर्यवश्च मिश्रैः कमलाभिधानः ॥११॥ शुभग्रह लग्न और सप्तम भाव में हों और पापग्रह दशम और चतुर्थ भाव में हों तो 'वज्र' योग होता है। इसके विपरीत यानि १, ७ भाव में पापग्रह और ४, १० भाव में शुभग्रह हों तो 'यव' योग होता है। यदि सभी केंद्रों में मिश्रित शुभ-पाप ग्रह बैठे हों तो 'कमल' योग होता है ॥११॥ त्यक्त्वा केन्द्राणि चेत्खेटाः शेषस्थानेषु संस्थिताः । वापीयोगो भवेदेवं गदितः पूर्वसूरिभिः ॥१२॥ यदि केंद्र से भिन्न स्थान (पणफर) में सभी ग्रह हों तो (वापी) योग होता है॥१२॥ लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्याच्चतुर्गृहस्थैर्गगनेचरेन्द्रैः । क्रमेण यूपश्च शरश्च शक्तिर्दण्डः प्रदिष्टः खलु जातकज्ञैः ॥१३॥ सभी ग्रह लग्न से चौथे भाव के अंदर ही हों तो 'यूप' योग होता है। सभी ग्रह लग्न से चौथे से सप्तम के अन्दर हों तो 'शर' योग होता है। सभी ग्रह सप्तम से दशम के अंदर हों तो 'शक्ति' योग होता है। सभी ग्रह दशम से लग्न के अंदर हों तो 'दंड' योग होता है ॥१३॥ लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः खमध्यात्सप्तर्क्षगैर्नौरथकूटसंज्ञः । छत्रं धनुश्चान्यगृहप्रवृत्तैर्नोपूर्व कैर्योग इहार्थचन्द्रः ॥१४॥ तनोर्धनाद्यैकगृहान्तरेण स्युः स्थानषट्के गगनेचरेन्द्राः । चक्राभिधानश्च समुद्रनामा योगा इतीहाकृतिजाश्च विंशत् ।।१५।। सभी ग्रह लग्न से सातवें भाव के अंदर हों तो 'नौका' योग होता है। सभी ग्रह चतुर्थ से दशम भाव के अंदर सात घरों में हो तो 'कूट' योग होता है। सभी ग्रह सप्तम से लग्न पर्यत सात भावों में हो तो 'छल' योग होता है। सभी ग्रह दशम से चतुर्थ भाव के अंदर सात भावों में हों तो 'चाप' योग होता है। इससे अतिरिक्त भावों में ग्रह हों तो 'अर्धचंद्र' योग होता है।।१४-१५।।

नाभसादियोगाध्यायः २०१ ये योगाः कथिताः पुरा बहुतरास्तेषामभावे भवेद् गोलश्चैकगतैर्युगं द्विगृहगैः शूलस्त्रिगेहोपगैः। केदारश्च चतुर्गृहगतैर्ग्रहैः पाशस्तु पञ्चस्थितैः षट्स्थैर्दामनिका च सप्तगृहगैर्वीणेति संख्या इमे ।।१६।। पूर्वोक्त योगों के अभाव में निम्नलिखित योग होते हैं। यदि सभी ग्रह एक ही राशि में हों तो 'गोल' योग, दो भावों में हों तो 'युग', तीन गृहों में हों तो 'शूल' योग, चार भावों में हों तो 'केदार' योग, पाँच राशियों में सभी ग्रह हों तो 'पाश' योग, ६ राशियों में हों तो 'दामिनी' योग और सभी ग्रह ७ राशियों में हों तो 'वीणा' नामक योग होता है।।१६।। रज्जुयोगफलम्- अटनप्रियाः सुरूपाः परदेशस्वास्थ्यभागिनो मनुजाः । क्रूरा खलस्वभावा रज्जुप्रभवाः सदा कथिताः ।।१७।। रज्जु योग में उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, स्वरूपवान्, परदेश में स्वस्थ रहनेवाला, क्रूर और खल स्वभाव का होता है।।१७।। मुसलयोगफलम्- मानज्ञानधनैश्वर्यैर्युक्ता नृपप्रियाः ख्याताः । बहुपुत्राः स्थिरचित्ता मुसलसमुत्था भवन्ति नराः ।।१८।। मुसल योग में उत्पन्न पुरुष मान, ज्ञान, धन, ऐश्वर्य से युक्त, राजा का प्रिय, प्रसिद्ध, अनेक पुत्रों वाला और स्थिरचित्त होता है।।१८।। नलयोगफलम्- न्यूनातिरिक्तदेहा धनसञ्चयभागिनोऽतिनिपुणाश्च । बन्धुहिताश्च सुरूपा नलयोगे सम्प्रसूयन्ते ।।१९।। नलयोग में उत्पन्न पुरुष हीन और अधिक अंगों वाला, धनसंचय करने वाला, अत्यंत चतुर, बंधुओं का हितैषी और सुरूप होता है।।१९।। मालायोगफलम्- नित्यं सुखप्रधाना वाहनवस्त्रान्नभोगसम्पन्नाः । कान्ताः सुबहुस्त्रीका मालायां सम्प्रसूताः स्युः ।।२०।। माला योग में उत्पन्न पुरुष नित्य सुखी, वाहन, वस्त्र-अन्नभोग से संपन्न, सुंदर शरीर, अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।।२०।।

२०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सर्पयोगफलम्- विषमाः क्रूरा निःस्वा नित्यं दुःखार्दिताः सुदीनाश्च। परभक्षपानविरताः सर्पप्रभवा भवन्ति नराः॥२१॥ सर्प योग में उत्पन्न पुरुष कुटिल, क्रूर, निर्धन, नित्य दुःखी, दीन और दूसरे भक्ष्य भोज्य से विरत रहने वाला होता है।।२१।। गदायोगफलम्- सततोद्युक्तार्थवंशा यज्वानः शास्त्रगेयकुशलाश्च। धनकनकरत्नसम्पत्संयुक्ता मानवा गदायां तु।।२२।। गदा योग में उत्पन्न पुरुष निरंतर धन के लिए उद्योगी, यज्ञ करने वाले, शास्त्र और संगीत में कुशल, धन, सुवर्ण, रत्न से युक्त होते हैं।।२२।। शकटयोगफलम्- रोगार्ताः कुनखा मूर्खाः शकटानुजीविनो निःस्वाः। मित्रस्वजनविहीनाः शकटे जाता भवन्ति नराः॥२३॥ शकट योग में उत्पन्न पुरुष रोगी, कुनखी, मूर्ख, गाड़ी से जीविका चलाने वाले और मित्र तथा स्वजनों से हीन होते हैं।।२३।। विहगयोगफलम्- भ्रमणरुचयो विकृष्टा दूताः सुरतानुजीविनो धृष्टाः। कलहप्रियाश्च नित्यं विहगे योगे सदा जाताः ।।२४।। विहग 'पक्षी' योग में उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, परतंत्र, दूत, सुरत से जीविका वाले, ढीठ और झगड़ालू होते हैं।।२४।। शृङ्गाटकयोगफलम्- प्रियकलहाः समरसहाः सुखिनो नृपतेः प्रियाः शुभकलत्राः। आढ्या युवतिद्वेष्याः शृङ्गाटकसम्भवा मनुजाः ।।२५।। शृंगाटक योग में उत्पन्न पुरुष कलहप्रिय, झगड़ालू, सुखी, राजा के प्रिय, सुंदर स्त्रियों से युक्त और स्त्री के द्वेषी होते हैं।।२५।। हलयोगफलम्- बह्वाशिनो दरिद्राः कृषीवला दुःखिताश्च सोद्वेगाः। बन्धुसुहृद्भिः सक्ताः प्रेष्या हलसंज्ञके सदा पुरुषाः ।।२६।। हल योग में उत्पन्न पुरुष बहुभोजी, दरिद्र, कृषि करने वाले, दुःखी, उद्वेग से युक्त, बंधु तथा मित्रों में आसक्त और दास होते हैं।।२६।।

नाभसादियोगाध्यायः २०३ वज्रयोगफलम्- आद्यन्तवयः सुखिनः शूराः सुभगा निरीहाश्च । भाग्यविहीना वज्रे जाता खला विरुद्धाश्च ॥२७॥ वज्र योग में उत्पन्न पुरुष आदि और अंत अर्थात् बाल्य और वृद्ध अवस्था में सुखी, शूर, सुंदर, निर्दय और भाग्यहीन होते हैं ॥२७॥ यवयोगफलम्- व्रतनियममङ्गलपरा वयसो मध्ये सुखार्थपुत्रयुताः । दातारः स्थिरचित्ता यवयोगभवाः सदा पुरुषाः ॥२८॥ यव योग में उत्पन्न पुरुष व्रत, नियम, मंगल को करने वाले, आयुष्य के मध्य में सुख, धन, पुत्र से युक्त, दाता और स्थिरचित्त होते हैं ॥२८॥ कमलयोगफलम्- विभवगुणाढ्याः पुरुषाः स्थिरायुषो विपुलकीर्तयः शुद्धाः । शुभशतकाः पृथ्वीशाः कमलभवा मानवा नित्यम् ॥२९॥ कमल योग में उत्पन्न पुरुष धन-ऐश्वर्य एवं गुणों से युक्त, दीर्घायु, अत्यंत कीर्तिमान्, सैकड़ों शुभ कार्य करने वाले राजा होते हैं ॥२९॥ वापीयोगफलम्- निधिकरणे निपुणधियः स्थिरार्थसुखसंयुताः सुतयुताश्च । नयनसुखसम्पहृष्टा वापीयोगेन राजानः ॥३०॥ वापी योग में उत्पन्न पुरुष धनसंग्रह में चतुर, स्थिर धन और संपत्ति से युक्त, पुत्रवान्, नेत्र को सुख देने वाले पदार्थों से युक्त राजा होते हैं ॥३०॥ यूपयोगफलम्- आत्मविदिज्यानिरतः स्त्रिया युतः सत्त्वसम्पन्नः । व्रतयमनियमे निरतो यूपे जातो विशिष्टश्च ॥३१॥ यूपयोग मे उत्पन्न पुरुष ज्ञानी, यज्ञकर्ता, स्त्री से युत, सत्त्वयुक्त, व्रत-नियम में संपृक्त और विशिष्ट व्यक्ति होता है ॥३१॥ शरयोगफलम्- इषुकरणे च समर्था मृगयाधनसेविताश्च मांसादाः । हिंस्राः कुशिल्पकराः शरयोगे मानवाः प्रसूयन्ते ॥३२॥

२०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् शरयोग में उत्पन्न पुरुष बाण बनाने वाले, आखेट के धन से सुखी, मांस खाने वाले, हिंसक, कुत्सित शिल्प करने वाले होते हैं।।३२।। शक्तियोगफलम्- धनरहितविफलदुःखितनीचालसाश्चिरायुषः पुरुषाः। संग्रामबुद्धिनिपुणाः शक्त्यां जाताः स्थिराः सुभगाः।।३३।। शक्ति योग में उत्पन्न पुरुष दरिद्र, निष्फल, दुःखी, नीच, आलसी, दीर्घजीवी, झगड़ालू बुद्धि और निपुण होते हैं।।३३।। दण्डयोगफलम्- हतदारपुत्रनिःस्वाः सर्वत्र च निर्घृणाः स्वजनबाह्याः। दुःखितनीचप्रेष्या दण्डंप्रभवा भवन्ति नराः।।३४।। दंड योग में उत्पन्न पुरुष स्त्री-पुत्र से हीन, निर्धन, निर्लज्ज, अपने स्वजनों से त्यक्त, दुःखी और नीचों के दास होते हैं।।३४।। नौकायोगफलम्- सलिलोपजीविविभवा बह्वाशाः ख्यातकीर्त्तयो दुष्टाः। कृपणा मलिना लुब्धा नौसञ्जाताः खलाः पुरुषाः।।३५।। नौका योग में उत्पन्न पुरुष जल से उत्पन्न पदार्थों से जीविका वाले, बहुत भोजन करने वाले, प्रसिद्ध कीर्त्ति वाले, दुष्ट, कृपण, मलिन और लोभी होते हैं।।३५।। कूटयोगफलम्- अनृतकथनवधपापा निष्किञ्चनाः शठाः क्रूराः। कूटसमुत्था नित्यं भवन्ति गिरिदुर्गवासिनो मनुजाः।।३६।। कूट योग में उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, पापी, वधिक, धूर्त, क्रूर, नित्य झूठे व्यापार वाले, पहाड़ और जंगलों में रहने वाले होते हैं।।३६।। छत्रयोगफलम्- स्वजनाश्रयो दयावान्नानानृपवल्लभः प्रकृष्टमतिः। प्रथमेऽन्त्ये वयसि नरः सुखवान्दीर्घायुरातपत्री स्यात्।।३७।। छत्रयोग में उत्पन्न पुरुष अपने जनों को आश्रय देने वाला, दयावान्, अनेक राजाओं का प्रिय, उत्तमबुद्धि से युक्त, प्रथम और अंतिम अवस्था में सुखी, दीर्घायु होता है।।३७।।

नाभसादियोगाध्यायः २०५ चापयोगफलम्- आनृतिकगुप्तपालाश्चौराः कितवाश्च कानने निरताः। कार्मुकयोगे जाता भाग्यविहीनाः शुभा वयोमध्ये ॥३८॥ चापयोग में उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, जेलखाने के मालिक, चोर, धूर्त्त, जंगल के प्रेमी, भाग्यहीन और अवस्था के मध्य में सुखी होते हैं॥३८॥ अर्धचन्द्रयोगफलम्- सेनापतयः सर्वे कान्तशरीरा नृपप्रिया बलिनः। मणिकनकभूषणयुता भवन्ति योगे वार्थचन्द्राख्ये ॥३९॥ अर्धचन्द्रयोग में उत्पन्न होने वाले सभी पुरुष सुंदर शरीर के, सेनापति, राजा के प्रिय, बली, मणि, सुवर्ण और आभूषणों से युक्त होते हैं॥३९॥ चक्रयोगफलम्- प्रणताशेषनराधिपकिरीटरत्नप्रभास्फुरितपादः। भवति नरेन्द्रो मनुजश्चक्रे यो जायते योगे ॥४०॥ चक्र योग में उत्पन्न पुरुष अनेक राजाओं के रत्नजटित मुकुटों से नमस्कार किये जाने वाला राजा होता है॥४०॥ समुद्रयोगफलम्- बहुरत्नधनसमृद्धा भोगयुता धनजनप्रियाः ससुताः। उदधिसमुत्थाः पुरुषाः स्थिरविभवाः साधुशीलाश्च ॥४१॥ समुद्रयोग में उत्पन्न पुरुष अनेक रत्न एवं धन से समृद्ध, भोगयुक्त, ज़नप्रिय, पुत्रवान्, स्थिर धनवाले और सज्जन होते हैं॥४१॥ वीणायोगफलम्- प्रियगीतनृत्यवाद्यनिपुणाः सुखिनश्च धनवन्तः। नेतारो बहुभृत्या वीणायां कीर्त्तिताः पुरुषाः ॥४२॥ वीणा योग में उत्पन्न पुरुष गीत, नाच और बाजा के प्रेमी, निपुण, सुखी, धनी, नेता, अनेक नौकरों वाले होते हैं॥४२॥ दामिनीयोगफलम्- दामिन्यामुपकारी नयधनयुक्तो महेश्वरः ख्यातः। बहुसुतरत्नसमृद्धो धीरो जायेत विद्वांश्च ॥४३॥

२०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् दामिनी योग में उत्पन्न पुरुष नीति और धन से युक्त, प्रभु, प्रसिद्ध, अनेक पुत्र, रत्न से समृद्ध और धीर तथा पंडित होता है।।४३।। पाशयोगफलम्- पाशे बन्धनभाजः कार्ये दक्षाः प्रपञ्चकाराश्च। बहुभाषिणो विशीला बहुभृत्याः सम्प्रतानाश्च ।।४४।। पाश योग में उत्पन्न पुरुष बंधन को भोगने वाले, कार्य में चतुर, प्रपंची, बहुत बोलने वाले, दुःशील और अनेक नौकरों से युक्त तथा परिवार वाले होते हैं।।४४।। केदारयोगफलम्- सुबहूनामुपयोज्याः कृषीवलाः सत्यवादिनः सुखिनः। केदारे सम्भूताश्चलस्वभावा धनैर्युक्ताः।।४५।। केदार योग में उत्पन्न पुरुष बहुतों के उपकारी, कृषिकर्त्ता, सत्यवादी, सुखी, चंचल और धनी होते हैं।।४५।। शूलयोगफलम्- तीक्ष्णालसधनहीना हिंस्राः सुबहिष्कृता महाशूराः। संग्रामे लब्धयशस्काः शूले योगे भवन्ति नराः।।४६।। शूल योग में उत्पन्न पुरुष बड़े आलसी, निर्धन, हिंसक, जातिबहिष्कृत, शूरवीर, संग्राम में लब्धकीर्त्ति वाले होते हैं।।४६।। युगयोगफलम्- पाखण्डवादिनो वा धनरहिता वा बहिष्कृता लोके। सुतमातृधर्मरहिता युगयोगे ये नरा जाताः।।४७।। युग योग में उत्पन्न पुरुष पाखंडी, निर्धन, लोक में बहिष्कृत, पुत्र- माता के धर्म से हीन होते हैं।।४७।। गोलयोगफलम्- बलसंयुक्ता विधना विद्याविज्ञानवर्जिता मलिनाः। नित्यं दुःखितदीना गोले योगे भवन्ति नराः।।४८।। गोलयोग में उत्पन्न पुरुष बलवान्, निर्धन, विद्या से हीन, मलिन, हमेशा दुःखी और दीन होते हैं।।४८।। सर्वास्वपि दशास्वेते भवेयुः फलदायिनः। प्रा...मिति विज्ञेयाः प्रवदन्ति तवाग्रजाः।।४९।।

अनेकयोगाध्यायः २०७ इन योगों का फल सभी ग्रहों की दशा में होता है, यह पूर्वजों का निर्णय है।।४९।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे नाभसयोगाध्यायः चतुर्दशः ।।१४।। अथानेकयोगाध्यायः अथ गजकेसरीयोगस्तत्फलं चाह- केन्द्रस्थिते देवगुरौ शशाङ्काद्योगस्तदाहुर्गजकेसरीति । दृष्टे सितार्येन्दुसुतैः शशाङ्के नीचास्तहीनैर्गजकेसरीति ।।१।। चन्द्रमा से केन्द्र में गुरु हो तो गजकेसरी योग होता है और चन्द्रमा नीच- अस्तादि में न गये हुए शुक्र, गुरु और बुध से देखा जाता हो तो गजकेसरी योग होता है।।१।। गजकेसरिसञ्जातस्तेजस्वी धनवान् भवेत्। मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरों भवेत् ।।२।। इस योग में उत्पन्न पुरुष धनी, मेधावी, गुणी एवं राजा का प्रिय करने वाला होता है।।२।। अथामलायोगस्तत्फलं चाह- लग्नाद्वा चन्द्रलग्नाद्वा दशमे शुभसंयुते । योगोऽयममला नाम कीर्त्तिराचन्द्रतारकी ।।३।। राजपूज्यो महाभोगी दाता बन्धुजनप्रियः। परोपकारी गुणवानमलायोगसम्भवः ।।४।। जन्मलग्न से वा चन्द्रमा से दशम स्थान में केवल शुभग्रह हों तो अमला योग होता हैं। अमला योग में उत्पन्न पुरुष की कीर्त्ति जब तक चन्द्रमा आकाश में रहेगा तब तक रहती है और वह राजा से पूज्य, महाभोगी, दाता और बंधुओं का प्रिय होता है ।।३-४।। अथ शुभाशुभयोगस्तत्फलं चाह- शुभाशुभाढ्ये यदि जन्मलग्ने शुभाशुभाख्यौ भवतस्तदानीम्। व्ययस्वगैः पापशुभैर्विलग्नात्पापाख्यसौम्यग्रहकर्त्तरी च ।।५।। शुभयोगभवो वाग्मी रूपशीलगुणान्वितः। पापयोगोद्भवः कामी पापकर्मपरार्थयुक् ।।६।। यदि लग्न में शुभग्रह युत हों तो शुभयोग और पापग्रह युत हों तो अशुभ योग होता है। १२।२ भाव में पापग्रह हों तो पापकर्त्तरी और शुभग्रह हों

२०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् तो शुभकर्त्तरी होती है। शुभ योग वा शुभ कर्त्तरी हो तो जातक बुद्धिमान्, रूप, शील, गुण से युक्त होता है। पापग्रह से उत्पन्न योग हो तो जातक कामी, पापकर्म करने वाला होता है।।५-६।। अथ पर्वतयोगस्तत्फलं चाह— सौम्येषु केन्द्रगृहगेषु सप्तनरंध्रे शुद्धेऽथवा शुभयुते यदि पर्वतः स्यात्। लग्नान्त्यपौ यदि परस्परकेन्द्रयातौ मित्रेक्षितौ भवति पर्वतनामयोगः ।।७।। भाग्यान्वितः पर्वतयोगजातो विद्याविनोदाभिरतः प्रदाता। कामो परस्त्रीजनकेलिलोलस्तेजो यशस्वी पुरनायकः स्यात् ।।८।। यदि सातवें, आठवें भाव में कोई ग्रह न हो अथवा शुभग्रह से युत हो और केन्द्रों में शुभग्रह हों तो पर्वत योग होता है। लग्नेश और व्ययेश केन्द्र में हों और मित्रग्रह से देखे जाते हों तो पर्वत योग में उत्पन्न पुरुष भाग्यवान्, विद्वान् और दाता होता है।।७-८।। अथ काहलयोगस्तत्फलं चाह— अन्यो ऽन्यकेन्द्रगृहगौ गुरुबन्धुनाथौ लग्नाधिपे बलयुते यदि काहलः स्यात् । कर्मेश्वरेण सहिते तु विलोकिते वा स्वोच्चे स्वके सुखपतौ यदि काहलः स्यात् ।।९।। ओजस्वी साहसी मूर्खश्चतुरङ्गबलैर्युतः। यत्किञ्चिद् ग्रामनाथस्तु काहले जायते नरः ।।१०।। गुरु और चतुर्थेश परस्पर केन्द्र में हों और लग्नेश बली हो तो काहल योग होता है। यदि सुखेश अपने उच्च या अपनी राशि का होकर कर्मेश से युत हो तो काहल योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष तेजस्वी, साहसी, मूर्ख, सेवा के बल से युक्त, कुछ ग्रामों का स्वामी होता है।।९- १०।। अथ चामरयोगस्तत्फलं चाह— लग्नेश्वरे केन्द्रगते स्वतुंगे जीवेक्षिते चामरनामयोगः। सौम्यद्वये लग्नगृहे कलत्रे नवास्पदे वा यदि चामरः स्यात् ।।११।। योगे जातश्चामरे राजपूज्यो विद्वान् वाग्मी पंडितो वा महीपः। सर्वज्ञः स्याद्वेदशास्त्राधिकारी जीवेल्लोके सप्ततिर्वत्सराणाम् ।।१२।।

अथानेकयोगाध्यायः २०९ लग्नेश अपनी उच्चराशि का होकर केन्द्र में हो और गुरु से देखा जाता हो तो (चामर) योग होता है। यदि लग्न सप्तम वा नवम वा दशम में दो शुभग्रह हों तो (चामर) योग होता है। चामरयोग में उत्पन्न पुरुष राजा से पूज्य, विद्वान्, वक्ता, पंडित वा राजा, सर्वज्ञ, वेद शास्त्र का अधिकारी, ७० वर्ष तक जीने वाला होता है॥११-१२॥ अथ शङ्खयोगः- अन्योन्यकेन्द्रगृहगौ सुतशत्रुनाथौ लग्नाधिपे बलयुतेयदुशंखयोगः। लग्नाधिपेच गगनाधिपतौ चरस्थे भाग्याधिपेबलयुते तु तथावदन्ति।। शंखे जांतो भोगशीलो दयालुः स्त्रौपुत्रार्थक्षेत्रवान् पुण्यकर्मा। शास्त्रज्ञानाचारसाधुक्रियावान् जीवेल्लोके वत्सराणामशीतिः ।।१४।। पंचमेश, षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों, लग्नेश बलवान् हो तो शंख योग होता है। लग्नेश, कर्मेश दोनों चर राशि में हों, भाग्येश बली हो तो (शंख) योग होता है। शंख योग में उत्पन्न पुरुष भोगी, दयालु, स्त्री, पुत्र, धन और क्षेत्र से युक्त पुण्य कार्य करने वाला, पंडित, सज्जन और ८० वर्ष तक जीने वाला होता है।।१३-१४।। अथ भेरीयोगमाह- स्वान्त्योदयास्तभवनेषु वियच्चरेषु कर्माधिपेबलयुते यदि भेरियोगः। केन्द्रे गते सुरगुरौ सितलग्ननाथौभाग्येश्वरे बलयुतेतु तथैववाच्यम् ।। दीर्घायुषो विगतरोगभया नरेन्द्रा बह्वर्थभूमिसुतदारयुताः प्रसिद्धाः। आचारभूरिसुखशौर्यर्महानुभावा भेरीप्रजागमनुजा निपुणाः कुलीनाः।।१६।। यदि २।१२।७ भाव में ग्रह हों और कर्मेश बली हो तो भेरी योग होता है। भाग्येश बली हो, गुरु, शुक्र, लग्नेश केन्द्र में हों तो भेरी योग होता है। भेरी योग में उत्पन्न पुरुष दीर्घायु, नीरोगी, निर्भय, राजा, भूमि, धन, पुत्र, स्त्री से युक्त, प्रसिद्ध, आचारवान्, सुख-पराक्रम से युक्त, निपुण और कुलीन होते हैं।।१५-१६।। अथ मृदङ्गयोगमाह- उच्चग्रहांशकपती यदि कोणकेन्द्रे तुङ्गस्वकीयभवनोपगते बलाढ्ये।

२१० . बृहत्पराशरहोराशास्त्रम् लग्नाधिपे बलयुते तु मृदङ्गयोगः कल्याणरूपनृपतुल्ययशः प्रदः स्यात् ।।१७।। जन्मकाल में ग्रह उच्चराशि का हो, उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र, कोण में अपने उच्च, स्वगृह में हो, बली हो और लग्नेश बली हो तो मृदंग योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष कल्याणकारी, राजा के समान यश वाला होता है।।१७।। अथ श्रीनाथयोगमाह- कामेश्वरे कर्मगते स्वतुंगे कर्माधिपे भाग्यपसंयुते च। श्रीनाथयोगः शुभदस्तदानीं जातो नरः शक्रसमो नृपालः ।।१८।। सप्तमेश दशम स्थान में हो, अपनी उच्चराशि में कर्मेश भाग्येश के साथ हो तो श्रीनाथ योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष इन्द्र के समान राजा होता है।।१८।। अथ शारदयोगः- योगः शारदसंज्ञकः सुतगते कर्माधिपे चन्द्रजे केन्द्रस्थे दिननायके निजगृहप्राप्तेऽतिवीर्यान्विते। चन्द्रात्कोणगते पुरन्दरगुरौ सौम्यत्रिकोणे कुजे लाभे वा यदि देवमन्त्रिणि बुधात्तच्छारदासंज्ञकः ।।१९।। स्त्रीपुत्रबन्धुसुखरूपगुणानुरक्ता भूपप्रियां गुरुमहीसुरदेवभक्ताः। विद्याविनोदरतिशीलतपोबलाढ्या जाताः स्वधर्मनिरता भुवि शारदाख्ये ।।२०।। यदि पाँचवें भाव में कर्मेश हो, बुध केन्द्र में हो और सूर्य अपनी राशि में अत्यंत बली हो अथवा चंद्रमा से ९, ५ भाव में गुरु हो, बुध से त्रिकोण में भौम हो, बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारद योग होता है। शारद योग में उत्पन्न पुरुष विद्या का विनोदी, कामी, शीलवान्, तपस्वी, अपने धर्म में निरत, स्त्री, पुत्र, बंधु के सुख से युक्त, राजा का प्रिय, गुरु, ब्राह्मण तथा देवता का भक्त होता है।।१९-२०।। अथ मत्स्ययोगः- लग्नधर्मगते पापे पञ्चमे सदसद्युते। चतुरस्रगते पापे योगोऽयं मत्स्यसंज्ञकः ।। कालज्ञः करुणासिन्धुर्गुणधीबलरूपवान्। यशोविद्यातपस्वी च मत्स्ययोगसमुद्भवः ।।२१।।

अथानेकयोगाध्यायः २११ लग्न से नवम भाव में पापग्रह हो, पाँचवें भाव में शुभग्रह, पापग्रह दोनों हों, चौथे या आठवें भाव में पापग्रह हों तो मत्स्य योग होता है। मत्स्ययोग में उत्पन्न पुरुष ज्योतिषी, करुणा की मूर्ति, गुणी, विद्वान्, बली, रूपवान्, यशस्वी वा तपस्वी होता है।।२१।। अथ कूर्मयोगः- कलत्रपुत्रारिगृहेषु सौम्याः स्वतुङ्गमित्रांशकराशियाताः। तृतीयलाभोदयगास्त्वसौम्या मित्रोच्चसंस्था यदि कूर्मयोगः।।२२।। विख्यातकीर्त्तिर्भुवि राज्यभोगी धर्माधिकः सत्त्वगुणप्रधानः। धीरः सुखी वागुपकारकर्त्ता कूर्मोद्भवो मानवनायको वा ।।२३।। अपने उच्च वा मित्रांश वा अपनी राशि में शुभग्रह ७-५-६ भाव में हो और अपने मित्र वा उच्च की राशि में गये हुए पापग्रह ३-११- १ भाव में हों तो कूर्मयोग होता है। कूर्मयोग में उत्पन्न पुरुष प्रसिद्ध कीर्त्तिवाला, राज्यभोग करने वाला, धार्मिक, सात्त्विक, धीर, सुखी, वाणी से उपकार करनेवाला अथवा राजा होता है।।२२-२३।। अथ खड्गयोगमाह- भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे। लग्नेशे केन्द्रकोणस्थे खड्गयोग इतीरितः।।२४।। वेदार्थशास्त्रनिखिलागमतत्त्वयुक्ति- बुद्धिप्रतापबलवीर्यसुखानुरक्ताः। निर्मत्सराश्च निजवीर्यमहानुभावाः खड्गे भवन्ति पुरुषाः कुशलाः कृतज्ञाः।।२५।। भाग्येश धनभाव में हो और धनेश भाग्यभाव में हो और लग्नेश केन्द्र- कोण में हो तो 'खड्गयोग' होता है। खड्गयोग में उत्पन्न पुरुष वेद के अर्थ को जानने वाले, शास्त्र तथा समस्त आगमशास्त्र के तत्त्व को जाननेवाले, बुद्धिमान्, प्रतापी, बलवान्, सुखी, मत्सरता से रहित, अपने पराक्रम से श्रेष्ठ, कुशल और कृतज्ञ होते हैं।।२४-२५।। अथ लक्ष्मीयोगफलम्- केन्द्रमूलत्रिकोणस्थे भाग्येशे परमोच्चगे। लग्नाधिपे बलाढ्ये च लक्ष्मीयोग इतीरितः।।२६।। गुणाभिरामो बहुदेशनाथो विद्यामहाकीर्त्तिरनङ्गरूपः। दिगन्तविश्रान्तनृपालवन्द्यो राजाधिराजो बहुदारपुत्रः।।२७।।

२१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाग्येश अपने परम उच्च में होकर केन्द्र (१-४-७-१०) वा अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो और लग्नेश बलवान् हो तो 'लक्ष्मी' योग होता है। लक्ष्मी योग में उत्पन्न पुरुष गुणों से युक्त, अनेक देशों का स्वामी, विद्या तथा महत्कीर्त्ति से युक्त, कामदेव के समान स्वरूप, दिशाओं में प्रसिद्ध, राजाओं से पूज्य, राजाओं का राजा और अनेक स्त्री-पुत्रों से युक्त होता है।।२६-२७।। अथ कुसुमयोगस्तत्फलं चाह- स्थिरलग्ने भृगौ केन्द्रे त्रिकोणेन्दौ शुभेतरे। मानस्थानगते सौरे योगोऽयं कुसुमो भवेत्।।२८।। दाता महीमण्डलनाथवन्द्यो भोगी महावंशजराजमुख्यः। लोके महाकीर्तियुतः प्रतापी नाथो नराणां कुसुमोद्भवः स्यात्।।२९।। स्थिरलग्न (२-५-८-११) में जन्म हो और शुक्र केंद्र में हो, चंद्रमा ५वें भाव में हो और १०वें स्थान में शनि हो तो 'कुसुम' योग होता है। कुसुम योग में उत्पन्न पुरुष दाता, राजाओं से वंद्य, भोगी, उत्तम कुल में उत्पन्न, राजाओं में मुख्य, संसार में कीर्तियुक्त, प्रतापी और राजा होता है।।२८-२९।। अथ पारिजातयोगस्तत्फलं चाह- विलग्ननाथस्थितराशिनाथः स्थानेशराशीशतदंशनाथः। केन्द्रत्रिकोणायगतो यदि स्यात्स्वतुङ्गगो वा यदि पारिजातः।।३०।। मध्यान्तसौख्यः क्षितिपालवन्द्यो युद्धप्रियो वारणवाजियुक्तः। स्वकर्मधर्माभिरतो दयालुर्योंगो नृपः स्याद्यदि पारिजातः।।३१।। लग्नेश जिस राशि में हो, उसका स्वामी जिस राशि में हो, उसका स्वामी वा उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र, त्रिकोण, लाभ स्थान में अथवा अपनी उच्चराशि में हो तो 'पारिजात' योग होता है। पारिजात योग में उत्पन्न पुरुष मध्य और अंतिम अवस्था में सुखी, राजा से वंदनीय, युद्धप्रिय, हाथी-घोड़ों से युक्त, अपने धर्म-कर्म में रत, दयालु होता है।।३०-३१।। अथ कलानिधियोगस्तत्फलं चाह- द्वितीये पञ्चमे जीवे बुधशुक्रयुतेक्षिते। क्षेत्रे तयोर्वा सम्प्राप्ते योगः स्यात्स कलानिधिः।।३२।।

अथानेकयोगाध्यायः २१३ कामी कलानिधिभवा सुगुणाभिरामः संस्तूयमानचरणो नरपालमुख्यैः। सेनांतुरङ्गमदवारणशङ्खभेरी वाद्यान्वितो विगतरोगभयारिसङ्घः ।।३३।। दूसरे या पाँचवें स्थान में गुरु हो, बुध, शुक्र से युत वा दृष्ट हो अथवा इन्हीं की राशि में हो तो 'कलानिधि' योग होता है। कलानिधि योग में उत्पन्न पुरुष कामी, सुंदर गुणों से युक्त, राजाओं से पूज्यचरण वाला, सेना, घोड़ा, मतवाले हाथी, शंख, भेरी आदि बाजाओं से युक्त, रोग, भय और शत्रु से रहित होता है।।३२-३३।। अथ पारिजातादियोगफलानि— सपारिजातद्युचरः सुखानि नीरोगतामुत्तमवर्गयातः। सगोपुरांशो यदि गोधनानि सिंहासनस्थः कुरुते विभूतिम् ।।३४।। करोति पारावतभागयुक्तो विद्यायशःश्रीविपुलं नराणाम्। सदेवलोको बहुयानसेनामैरावतस्थो यदि भूपतित्वम् ।।३५।। अपने पारिजात भाग (पृ० ५३) में ग्रह हो तो सुख होता है। उत्तम वर्ग में हो तो नीरोग करता है। गोपुरांश में हो तो गौ और धन देता है। सिंहासनांश में हो तो विभूति अर्थात् ऐश्वर्य को देता है। पारावत भाग में हो तो विद्या, यश, विपुल लक्ष्मी को देता है। देवलोकांश में हो तो अनेक सवारी और सेना से युक्त होता है। ऐरावत अंश में हो तो जातक राजा होता है।।३४-३५।। अथ लग्नाधियोगस्तत्फलं चाह— लग्नाच्च दाराष्टमगेहसंस्थैः शुभैर्न पापग्रहयोगदृष्टैः। लग्नाधियोगो हि तथा प्रसिद्धः पापैः सुखस्थानविवर्जितैश्च ।।३६।। लग्नाधियोगे बहुशास्त्रकर्त्ता विद्याविनीतश्च बलाधिकारी। मुख्यस्तु निष्कापटिको महात्मा लोके यशोवित्तगुणाधिकः स्यात्।। लग्न से सातवें, आठवें भाव में शुभग्रह पापग्रह से दृष्ट-युत न हों और चौथे भाव में पापग्रह न हों तो लग्नाधियोग होता है। लग्नाधियोग में उत्पन्न जातक अनेक शास्त्रों को बनाने वाला, विद्वान्, नम्र, सेनाधिकारी, मुख्यतः निष्कपट महात्मा और संसार में यश, धन और गुण से प्रसिद्ध होता है।।३६-३७।।