बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथानेकयोगाध्यायः २११ लग्न से नवम भाव में पापग्रह हो, पाँचवें भाव में शुभग्रह, पापग्रह दोनों हों, चौथे या आठवें भाव में पापग्रह हों तो मत्स्य योग होता है। मत्स्ययोग में उत्पन्न पुरुष ज्योतिषी, करुणा की मूर्ति, गुणी, विद्वान्, बली, रूपवान्, यशस्वी वा तपस्वी होता है।।२१।। अथ कूर्मयोगः- कलत्रपुत्रारिगृहेषु सौम्याः स्वतुङ्गमित्रांशकराशियाताः। तृतीयलाभोदयगास्त्वसौम्या मित्रोच्चसंस्था यदि कूर्मयोगः।।२२।। विख्यातकीर्त्तिर्भुवि राज्यभोगी धर्माधिकः सत्त्वगुणप्रधानः। धीरः सुखी वागुपकारकर्त्ता कूर्मोद्भवो मानवनायको वा ।।२३।। अपने उच्च वा मित्रांश वा अपनी राशि में शुभग्रह ७-५-६ भाव में हो और अपने मित्र वा उच्च की राशि में गये हुए पापग्रह ३-११- १ भाव में हों तो कूर्मयोग होता है। कूर्मयोग में उत्पन्न पुरुष प्रसिद्ध कीर्त्तिवाला, राज्यभोग करने वाला, धार्मिक, सात्त्विक, धीर, सुखी, वाणी से उपकार करनेवाला अथवा राजा होता है।।२२-२३।। अथ खड्गयोगमाह- भाग्येशे धनभावस्थे धनेशे भाग्यराशिगे। लग्नेशे केन्द्रकोणस्थे खड्गयोग इतीरितः।।२४।। वेदार्थशास्त्रनिखिलागमतत्त्वयुक्ति- बुद्धिप्रतापबलवीर्यसुखानुरक्ताः। निर्मत्सराश्च निजवीर्यमहानुभावाः खड्गे भवन्ति पुरुषाः कुशलाः कृतज्ञाः।।२५।। भाग्येश धनभाव में हो और धनेश भाग्यभाव में हो और लग्नेश केन्द्र- कोण में हो तो 'खड्गयोग' होता है। खड्गयोग में उत्पन्न पुरुष वेद के अर्थ को जानने वाले, शास्त्र तथा समस्त आगमशास्त्र के तत्त्व को जाननेवाले, बुद्धिमान्, प्रतापी, बलवान्, सुखी, मत्सरता से रहित, अपने पराक्रम से श्रेष्ठ, कुशल और कृतज्ञ होते हैं।।२४-२५।। अथ लक्ष्मीयोगफलम्- केन्द्रमूलत्रिकोणस्थे भाग्येशे परमोच्चगे। लग्नाधिपे बलाढ्ये च लक्ष्मीयोग इतीरितः।।२६।। गुणाभिरामो बहुदेशनाथो विद्यामहाकीर्त्तिरनङ्गरूपः। दिगन्तविश्रान्तनृपालवन्द्यो राजाधिराजो बहुदारपुत्रः।।२७।।