बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० . बृहत्पराशरहोराशास्त्रम् लग्नाधिपे बलयुते तु मृदङ्गयोगः कल्याणरूपनृपतुल्ययशः प्रदः स्यात् ।।१७।। जन्मकाल में ग्रह उच्चराशि का हो, उसके नवांश का स्वामी यदि केन्द्र, कोण में अपने उच्च, स्वगृह में हो, बली हो और लग्नेश बली हो तो मृदंग योग होता है। इस योग में उत्पन्न पुरुष कल्याणकारी, राजा के समान यश वाला होता है।।१७।। अथ श्रीनाथयोगमाह- कामेश्वरे कर्मगते स्वतुंगे कर्माधिपे भाग्यपसंयुते च। श्रीनाथयोगः शुभदस्तदानीं जातो नरः शक्रसमो नृपालः ।।१८।। सप्तमेश दशम स्थान में हो, अपनी उच्चराशि में कर्मेश भाग्येश के साथ हो तो श्रीनाथ योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष इन्द्र के समान राजा होता है।।१८।। अथ शारदयोगः- योगः शारदसंज्ञकः सुतगते कर्माधिपे चन्द्रजे केन्द्रस्थे दिननायके निजगृहप्राप्तेऽतिवीर्यान्विते। चन्द्रात्कोणगते पुरन्दरगुरौ सौम्यत्रिकोणे कुजे लाभे वा यदि देवमन्त्रिणि बुधात्तच्छारदासंज्ञकः ।।१९।। स्त्रीपुत्रबन्धुसुखरूपगुणानुरक्ता भूपप्रियां गुरुमहीसुरदेवभक्ताः। विद्याविनोदरतिशीलतपोबलाढ्या जाताः स्वधर्मनिरता भुवि शारदाख्ये ।।२०।। यदि पाँचवें भाव में कर्मेश हो, बुध केन्द्र में हो और सूर्य अपनी राशि में अत्यंत बली हो अथवा चंद्रमा से ९, ५ भाव में गुरु हो, बुध से त्रिकोण में भौम हो, बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारद योग होता है। शारद योग में उत्पन्न पुरुष विद्या का विनोदी, कामी, शीलवान्, तपस्वी, अपने धर्म में निरत, स्त्री, पुत्र, बंधु के सुख से युक्त, राजा का प्रिय, गुरु, ब्राह्मण तथा देवता का भक्त होता है।।१९-२०।। अथ मत्स्ययोगः- लग्नधर्मगते पापे पञ्चमे सदसद्युते। चतुरस्रगते पापे योगोऽयं मत्स्यसंज्ञकः ।। कालज्ञः करुणासिन्धुर्गुणधीबलरूपवान्। यशोविद्यातपस्वी च मत्स्ययोगसमुद्भवः ।।२१।।