भारतकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 800 में से

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भावेशफलाध्यायः १९७ लाभेशे संस्थिते लाभे स वाग्मी भवति ध्रुवम् । पाण्डित्यं कविता चैव वर्धते च दिने दिने ॥८४॥ लाभेश लाभ भाव में हो तो जातक बुद्धिमान्, पंडित और कवि होता है ॥८४॥ प्राप्तिस्थानाधिपे रिःफे म्लेच्छसंसर्गकारकः । कामुको बहुकान्तश्च क्षणिको लम्पटः सदा ॥८५॥ लाभेश बारहवें भाव में हो तो जातक नीचों से संसर्ग करने वाला, कामी, अनेक स्त्रियों वाला और लम्पट होता है ॥८५॥ अथ व्ययेशभावफलम्- व्ययेशे मदने लग्ने जायासौख्यं भवेन्न हि । दुर्बलः कफरोगी च धनविद्याविवर्जितः ॥८६॥ व्ययेश सातवें या लग्न में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन-विद्या से हीन होता है ॥८६॥ व्ययेशे च धने रन्ध्रे विष्णुभक्तिसमन्वितः । धार्मिकः प्रियवादी च सम्पूर्णगुणसंयुतः ॥८७॥ व्ययेश दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक, प्रियभाषी, गुणी होता है ॥८७॥ भार्याद्वेषी प्रियद्वेषी गुरुद्वेषी भवेन्नरः । व्ययेशे सहजे धर्मे स्वशरीरस्य पोषकः ॥८८॥ व्ययेश तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक, स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है ॥८८॥ पुत्रहीनो महादुःखी तीर्थाटनपरो भवेत् । कृपणो रोगयुक्तश्च व्ययेशे च सुते सुखे ॥८९॥ व्ययेश पाँचवें या चौथे भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महादुःखी, तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है ॥८९॥ व्ययेशेऽरिव्यये पापी मातृमृत्युविचिन्तकः । क्रोधी सन्तानदुःखी च परजायासु लम्पटः ॥९०॥ व्ययेश छठें या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है ॥९०॥

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