बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् व्ययेशे दशमे लाभे पुत्रसौख्यं भवेन्न हि। मणिमाणिक्यमुक्तादि धत्ते किञ्चित्समालभेत् ।।९१।। व्ययेश दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि- माणिक्य आदि के होते हुए भी सुखहीन होता है।।९१।। एतत्ते कथितं विप्र भावेशानां तु यत् फलम्। बलाबलविवेकेन सर्वेषां फलमादिशेत् ।।९२।। जो भावेशों के फल कहे गये हैं वे ग्रहों के बल-अबल के अनुसार ही होते हैं।।९२।। ग्रहे पूर्णबले प्राप्ते फलं पूर्ण समादिशेत् । अर्धमर्धबले प्राप्ते हीने पादं समादिशेत् ।।९३।। भावानां द्वादशानां च सर्वेषां फलमादिशेत् । उक्तं भावस्थितानां च भावेशानां फलं मया ।।९४।। ग्रह पूर्णबली हो तो पूर्णबल, मध्यबली हो तो आधाबल और हीनबली हो तो चतुर्थांश फल देता है।।९४।। इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां भावेशफलाध्यायः त्रयोदशः ।।१३।। अथ नाभसादियोगाध्यायः अधुना नाभसा योगाः कथयामि सविस्तरः। अष्टादशशतगुणितास्तेषां भेदाः समासतः ।।१।। अब मैं नाभस योगों को विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, जिनके भेद १८०० होते हैं।।१।। आश्रयाख्यास्त्रयो योगा दशयोगद्वयं ततः। आकृतिर्विंशतिः संख्या योगानां सप्तकं स्मृतम् ।।२।। जिसमें आश्रय योग ३, दल योग २, आकृति योग २० और संख्या योग ७ मुख्य हैं।।२।। तेषां नामानि- रज्जुयोगो मूसलश्च नलो मालाभुजङ्गमौ। गदायोगश्च शकटः शृङ्गाटकविहङ्गमौ ।।३।।