बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाभसादियोगाध्यायः १९९ हलवज्रयवाश्चैव कमलो वापि यूपकौ। शरशक्तिदण्डनौकाकूटछत्रधनूंषि च ॥४॥ अर्धेन्दुयोगश्चक्राख्यः समुद्रश्चेति विंशतिः। वीणादामनिकायोगः पाशकेदारशूलकाः॥५॥ युगगोलो ततः प्रोक्तौ योगा द्वात्रिंशका इमे। तेषां च लक्षणं वक्ष्ये यथाबुद्धिविवेकतः॥६॥ रज्जु, मुशल, नल ये आश्रययोग हैं और मालासर्प ये दलयोग हैं। गदा, शकट, शृंगाटक, पक्षी, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप, शरशक्ति, दंड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्धचक्र, चक्र, समुद्र-ये २० आकृतियोग हैं। वीणा, दाम, पारा, केदार, शूल, युग, गोल ये ७ संख्या योग हैं। ये सभी मिलकर ३२ नाभस योग कहे जाते हैं। अब इनके लक्षण कह रहा हूँ॥३-६॥ अथाऽऽश्रययोगलक्षणम्- सर्वे चरस्था अपि वा स्थिरस्था द्विदेहसंस्था यदि वा भवन्ति। क्रमेण रज्जुर्मुशलं नलश्च योगत्रयं स्यादिदमाश्रयाख्यम्॥७॥ यदि सभी ग्रह चर राशि में हों तो रज्जुयोग, सभी स्थिर राशि में हों तो मुशल योग और सभी ग्रह द्विस्वभाव राशि में हों तो नलयोग होता है। ये तीन आश्रय योग हैं॥७॥ अथ दलयोगद्वयमाह- केन्द्रत्रये सौम्यखगैस्तु माला खलग्रहैर्व्यालसमाह्वयः स्यात्। इदं तु योगद्वितयं दलाख्यं मुनीश्वरेण प्रतिपादितं हि॥८॥ यदि किसी भी तीन केंद्रों में शुभग्रह हों तो माला योग होता है। यदि पापग्रह हों तो व्याल योग होता है। ये दोनों दल योग हैं॥८॥ अथ विंशत्याकृतियोगमाह- आसन्नकेन्द्रद्वयगैर्गदाख्यो लग्नास्तसंस्थैः शकटः समस्तैः। खबन्धुयातैर्विहगः प्रदिष्टः शृङ्गाटकं लग्ननवात्मजस्थैः॥९॥ यदि सभी ग्रह समीप के दो केंद्रों में हों तो 'गदा' योग होता है। सभी ग्रह केवल लग्न और सप्तम में हों तो शकट योग होता है। यदि सभी ग्रह दशम और चतुर्थ में हों तो 'विहग' योग होता है। सभी ग्रह लग्न नवम और पाँचवें भाव में हों तो 'शृंगाटक' योग होता है॥९॥